भारत गणतंत्र सेल पर लगा है। बड़े बड़े बैनर मौजूद है जो हमे बता रहे हैं कि भारत देश का कौन सा हिस्सा आप कितने में और किससे खरीद सकते हैं। सांसद बिक रहे हैं, लाइसेंस बिक रहे हैं, शपथ पत्र बिक रहे हैं, पहाड़, सागर और खदाने बिक रही है, जो बिक सकता है वो बिक रहा है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र परचून की दुकान हो गया है। तराजू पर बैठ कर डंडी मारने वाले अलग अलग चेहरे हैं और इस समय नीरा राडिया का चेहरा सबसे ज्यादा चर्चा में है। नीरा राडिया दुनिया भर में घूमने वाली और दुनिया के सबसे अमीर लोगों को तुम कह कर बुलाने वाली नारी है और उसके नारी होने में न उसका कोई श्रेय हैं और न दोष। सफल लोग व्यक्तित्वों और लिंग भेदों की सीमा से बाहर निकल जाते हैं। नीरा राडिया को उसके लगभग एक साल से चर्चित कर्मों और अपकर्मों के लिए सवाल करने का अवसर खोजा जा रहा था मगर जब इस महादलाल के उप दलालों के टेप सार्वजनिक हो गए और अभी करीब पचपन घंटे के टेप तो सुने ही नहीं गए हैं तो जा कर प्रवर्तन निदेशालय को याद आया कि नीरा राडिया से बात करनी है। एक जमाना था जब नेहरू जी और इंदिरा गांधी के काल में कोटा, परमिट, लाइसेंस राज बहुत सुना जाता था। सीमेंट, सरिया और पत्थर तो छोड़िए, रेडियो सुनने का भी लाइसेंस लगता था। जहां लाइसेंस चाहिए वहां फीस भी देनी पड़ती है। कुछ की रसीद मिलती है और कुछ की नहीं मिलती। मनमोहन सिंह जब फिरंगी शैली में अपने सनातन भारत देश की व्यापार और अर्थव्यवस्था की गति पर आ गए तो ये कोटा परमिट लाइसेंस तो खारिज हो गए मगर उनकी जगह एक नई कॉरपोरेट संस्कृति ने ली जहां सब कुछ और ज्यादा बेशर्मी से बिकता था। सब बाजार में हाजिर हैं, सही सेल्समैंन और चतुर खरीददार चाहिए। अवसर का फायदा उठाने के लिए हर वर्ग से लोग मौजूद हैं। लोगों को आदर्शों का पाठ पढ़ाने वाले हमारे पत्रकार साथी भी हैं, होटलों को हार्डवेयर कहने वाले सरकारी अफसर भी हैं, मंत्री बनने के लिए एक दलाल से घंटो गिड़गिड़ाने वाले नेता भी हैं और अब तो ऐसे प्रधानमंत्री भी हैं जिनसे देश की सबसे बड़ी अदालत उनके कर्मो के लिए सफाई मांग सकती है और मांगती है। नीरा राडिया से पूछताछ अभी चलेगी और कोई आश्चर्य नहीं कि अपनी खाल बचाने के लिए राडिया को गिरफ्तार कर के जेल में भी डाल दिया जाए। ऐसा नहीं कि नीरा राडिया बहुत बड़ी पुण्य आत्मा है और उनके जेल जाने से प्रलय आ जाएगी मगर सवाल उस मानसिकता का है जिसमें देश को उपभोक्ता वस्तु मान लिया गया है और बिकने के लिए उपलब्ध करवा दिया गया है। कल हर्षद मेहता था, केतन पारिख था, धीरेंद्र ब्रह्मचारी था और आज नीरा राडिया हैं। उस समय भी उनके आसपास लोग मंडराते थे और आज भी मंडराते हैं। इनसे प्रेरणा पा कर देश की दलाली करने वालों की एक पूरी पीढ़ी तैयार हो रही है। नीरा राडिया का फोन आयकर वालों ने टेप किया। गृह मंत्रालय की अनुमति चाहिए थी इसलिए वह मांग ली गई। लेकिन सच यह है कि इस टेप रिकॉर्डिंग से जो निकल कर आया है वह ज्यादा आयकर वालों के मतलब का नहीं है। इसमें तो दलालाें के चेहरे उजागर हो रहे हैं और नीरा राडिया ने पहले ही दिन अपनी कंपनी वैष्णवी कम्युनिकेशंस से ले कर निजी और दूसरे खातों के इनकम टेक्स रिकॉर्ड जमा करा दिए। आयकर वालों के पास इसके बाद नीरा राडिया के लिए कोई आरोप पत्र बचा ही नहीं रह जाता। हमारे मिस्टर क्लीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बेदाग और ईमानदारी की मूर्ति बनाने के लिए आखिरकार खुद सोनिया गांधी को गरजना पड़ा। उनकी मजबूरी थी। जो आदमी नगरपालिका का चुनाव नहीं जीत पाता उसे एक दम पारसी थिएटर के अंदाज में सोनिया गांधी ने देश का प्रधानमंत्री बना दिया और अच्छे बच्चे अपने खिलौनों की सुरक्षा खुद करते हैं। श्रीमती गांधी भी हमारे खिलौना प्रधानमंत्री की रक्षा में लगी हुई है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश के किसी और प्रधानमंत्री के राजकाज में इतने ज्यादा और इतने धारावाहिक घोटाले नहीं हुए जितने हमारे बेदाग प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के जमाने में हुए। कोई नहीं कहेगा कि खुद मनमोहन सिंह नीरा राडिया के दलालों में या ग्राहकों में शामिल हैं। नीरा राडिया ने खुद भी कभी दावा नहीं किया कि उनकी जान पहचान सीधे भारत के प्रधानमंत्री से हैं लेकिन अगर सफल और साफ प्रशासन का श्रेय देश के शासक को मिलता है तो पाप के इन दस्तावेजों पर हमारे प्रधानमंत्री का अंगूठा क्यों नहीं लगवाया जा सकता? राडिया और टू जी स्पेक्ट्र वाला मामला सामने इसलिए ही आ पाया क्योंकि इसमें हजारों करोड़ का खेल था और जो लोग हजारों करोड़ के खेल कर सकते हैं वे एक दूसरे को नंगा करने में कितनी देर लगाएंगे?ए राजा, नीरा राडिया, दयानिधि मारन, रतन टाटा, अनिल और मुकेश अंबानी सबके नाम सामने आए ही इसलिए क्याेंकि सबके पास एक दूसरे को निर्वसन करने के साधन मौजूद थे। यह भारत की कलंक कथा का अंत नहीं है बल्कि सिर्फ एक और बड़ी कलंक कथा है और सबसे बड़ी बात तो यह है कि अभी तक इसे भारत के इतिहास का आंकड़ों के हिसाब से सबसे बड़ा घोटाला कहा जा रहा है मगर अगला घोटाला कब इसे विस्थापित कर देगा यह कौन कह सकता है? नटवर लाल को हर्षद मेहता ने, हर्षद मेहता को अब्दुल करीम तेलगी ने, तेलगी को केतन पारिख ने और केतन पारिख को नीरा राडिया ने विस्थापित किया है और अब अपने देश को न चौकने की आदत पड़ गई है। इसलिए ये कहानियां होती रहेगी। ईमानदारी और मानवीय गुणो के सबसे ज्यादा मंत्र और भाष्य शायद भारतीय ग्रंथो में ही मौजूद हैं लेकिन अब अपना समाज भाष्यों से नहीं बल्कि जमीनी हकीकतों से चलता है और ये हकीकते अलग अलग सम्मानित माने जाने वाले पेशें में बैठे महापुरुषाें को बाकी समाज से ज्यादा पता है। हम और आप तो सिर्फ सपना देख सकते हैं कि सब कुछ वैसे ही होगा जैसे उसका होना चाहिए मगर हम और आप भी वहीं हैं जो रेल में सीट पक्की कराने के लिए टीटी को पैसा खिलाने से नहीं चूकते और अपने दरवाजे पर कूड़ा जमा नहीं रहे इसके लिए कमेटी के जमादार को रिश्वत भी खिलाते हैं।
साभार..डेट लाइन इंडिया com
शनिवार, 27 नवंबर 2010
गुरुवार, 25 नवंबर 2010
चौथा मोर्चा अख़बार की लूट ...
इस पत्र के माध्यम से मै आपको एक ऐसे सापताहिक लुटेरे अख़बार के बारे में बताना चाहता हूँ जो की मात्र 7 माह में उत्तर परदेश के दो दर्जन जिलो से पाठको के कई लाख रुपये लेकर नदारद हो गया और आज उस अख़बार से जुड़े सैंकड़ो संबाददाता पाठको से मुह चुराते हुए पत्रकारिता छोड़ने को मजबूर हो गये है .जबकि लखनऊ में बैठकर उस अख़बार को चलाने वाले बरिष्ठ पत्रकारों ने लोगो को लुट कर अब दूसरी जगह नौकरिया कर ली है और कुछ लोगो ने तो अपना मोबाइल नंबर बदल दिया , रिपोर्टरों के फ़ोन करने पर अब उनका नंबर ही नही मिलता ,बता दे की वह अख़बार था मध्य परदेश के इंदौर १११ बांसी ट्रेड सेण्टर ऍम जी रोड से परकाशित चौथा मोर्चा साप्ताहिक अख़बार जो की उत्तर परदेश ,महाराष्ट्र .राजस्थान सहित कई अन्य राज्यों से पर्कासित होने का दावा कर रहा था खूब परचार परसार किया गया अख़बार के संचालको ने लखनऊ में अख़बार की कमान हिंदुस्तान ,दैनिक जागरण जैसे अख़बार में अपनी कई साल तक सेवाए दे चुके एक वरिष्ठ पत्रकार नरेश दीक्षित को सौंपा जो की अब पायनिअर हिंदी में काम कर रहे है उन्होंने अपने पुराने संबंधो का उपयोग करते हुए बड़ी तेज़ी से पूरे उत्तर परदेश के सभी जिलो से जिला पर्तिनीधियो को जोड़ा इस शर्त के साथ की जिले पर काम करने वाले रिपोर्टर को कार्यालय खर्च के साथ 8000rs वेतन दिया जायेगा जबकि रिपोर्टर को अपने पूरे जनपद में अख़बार के कमसे कम 100 ग्रहक जो की वार्षिक होगा बनाना होगा उसके लिए संसथान ने सभी पत्रकारों को एक माह का समय दिया था लोगो ने वेतन की लालच में अपना लक्ष्य पूरा किया इतना ही नही संसथान ने लोगो को ब्लाक स्तर तक रिपोर्टर बनाने की भी बात कही और शर्त रखा की सभी ब्लाको में कमसे कम 50-50 मेम्बर बनाये जिसका भुगतान 150rs की दर से रिपोर्टर तुरंत करे बाद में वह मेम्बर बनाता रहेगा संसथान उसे परिचय पत्र और 2500rs माशिक वेतन देगा इतना ही नही हर माह 100 मेम्बर बनाने वाले रिपोर्टरों को 3000rs वेतन गिफ्ट जिसमे आचार पापड़ और अन्य खाने की चीजों के साथ पठाके भी होगे जो की संसथान के मालिक लोग खुद बनाते है .साथ ही सदस्यों को एक टेबल घडी दी जाएगी .लोगो ने संसथान के दबाब में आकर 100-100,50-50 मेम्बरों का धन अपने घर से लाकर अपने परचितो को अख़बार की सदस्यता दिलाकर जमा किया की आगे अख़बार चल जायेगा तो सब अच्छा हो जायेगा पर ऐसा हुआ नही संसथान ने लोगो की सदस्यता करवा कर अख़बार बंद कर दिया .जब रिपोर्टर लखनऊ ऑफिस बी ४९ तेजकुमार प्लाज़ा हजरतगंज में फ़ोन कर पूछते की अख़बार कब आएगा तो कहा जाता की अगले हफ्ते यह कर्म जून के अंतिम सप्ताह से सुरु हुआ और अगस्त तक चला उसके बाद किसी अधिकारी का मोबाइल भी नही मिला ,बता दे की मार्च में सुरु हुआ यह अख़बार जून यानि 4 माह में ही पाठको रिपोर्टरों के लाखो रूपये लेकर भाग गया अब हालत यह है की अपने क्षेत्रो में मेम्बर बनाकर संसथान की जेब भरने वाले पत्रकारों को पाठको के गुस्से का शिकार होना पड़ रहा है इतना ही नही जिला रिपोर्टरों को तो अपने द्वारा जोड़े गये तहसील रिपोर्टरों को अपने घर से 100-100 मेम्बरों के पैसे वापस करने पड़ रहे है जिससे लोग मुह छुपाने को मजबूर है जबकि संसथान अपना सटर गिरा कर गायब हो चुका है ..जबकि 4 माह तक मुफ्त में काम करवाने वाले चौथा मोर्चा ने अपने रिपोर्टरों को न ही वेतन दिया न ही कोई -कार्ड जिससे वो कह सके की उन्होंने उनके यंहा काम किया है
चौथा मोर्चा साप्ताहिक
सम्पादक -रवि गर्ग
१११,बांसी ट्रेड सेण्टर .ऍम जी रोड
Indaur मध्य परदेश
फ़ोन -०७३१-४२८०१०७,८,९,
बुधवार, 24 नवंबर 2010
Politician's drama

Mr। Rahul Gandhi do this work just for an hour....without media.Then tell us what you got...If you really want to Change our India ....No need to show us.....We will follow you......Definitely.
२--Govt. Concessions for a Member of Parliament (MP)
Monthly Salary
: 12,000 Expense for Constitution per month : 10,000 Office expenditure per month : 14,000 Traveling concession (Rs. 8 per km) : 48,000
( eg।For a visit from kerala to Delhi & return: 6000 km) Daily DA TA during parliament meets : 500/day Charge for 1 class (A/C) in train: Free (For any number of times) (All over India ) Charge for Business Class in flights : Free for 40 trips / year (With wife or P.A .) Rent for MP hostel at Delhi : Free Electricity costs at home : Free up to 50,000 units Local phone call charge : Free up to 1 ,70,000 calls. TOTAL expense for a MP [having no qualification] per year : 32,00,000 [ i.e. 2.66 lakh/month] TOTAL expense for 5 years : 1,60,00,000 For 534 MPs, the expense for 5 years : 8,54,40,00,000 (nearly 855 crores) AND THE PRIME MINISTER IS ASKING THE HIGHLY QUALIFIED, OUT PERFORMING CEOs TO CUT DOWN THEIR SALARIES..... This is how all our tax money is been swallowed and price hike on our regular commodities....... And this is the present condition of our country:
Monthly Salary
: 12,000 Expense for Constitution per month : 10,000 Office expenditure per month : 14,000 Traveling concession (Rs. 8 per km) : 48,000
( eg।For a visit from kerala to Delhi & return: 6000 km) Daily DA TA during parliament meets : 500/day Charge for 1 class (A/C) in train: Free (For any number of times) (All over India ) Charge for Business Class in flights : Free for 40 trips / year (With wife or P.A .) Rent for MP hostel at Delhi : Free Electricity costs at home : Free up to 50,000 units Local phone call charge : Free up to 1 ,70,000 calls. TOTAL expense for a MP [having no qualification] per year : 32,00,000 [ i.e. 2.66 lakh/month] TOTAL expense for 5 years : 1,60,00,000 For 534 MPs, the expense for 5 years : 8,54,40,00,000 (nearly 855 crores) AND THE PRIME MINISTER IS ASKING THE HIGHLY QUALIFIED, OUT PERFORMING CEOs TO CUT DOWN THEIR SALARIES..... This is how all our tax money is been swallowed and price hike on our regular commodities....... And this is the present condition of our country:
855 crores could make their life livable !! Think of the great democracy we have............. PLEASE FORWARD THIS MESSAGE TO ALL REAL CITIZENS OF INDIA ..... but, STILL Proud to be INDIAN
दूरदर्शन जनता के पास क्यों नहीं आता?

अभी तीन महीने पहले दूरदर्शन ने पचासवीं साल गिरह मनाई है। जहां तक पहुंच की बात है, दूरदर्शन सारे निजी टीवी चैनलों को मिला कर भी उनसे ज्यादा दूरी तक और ज्यादा लोगों तक पहुंचता है। यह बात अलग है कि दूरदर्शन कार्यक्रमों की आतिशबाजियां नहीं बिखेरता और न सनसनीखेज समाचार देता है और टीआरपी की दौड़ में तो खैर वह शामिल ही नहीं है। फिर भी अकेला दूरदर्शन है जो बगैर केबल ऑपरेटर के, बगैर डिश एंटिना लगाए और बगैर किसी किस्म का एंटिना लगाए देश में कहीं भी देखा जा सकता है। इस पहुंच का बहुत सारा लाभ देश के विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में उठाया जा सकता था मगर बाबुओं की जो फौज इसे चला रही है वह ऐसा नहीं होने देती। 15 सितंबर 1959 को दूरदर्शन की शुरूआत संसद मार्ग नई दिल्ली पर आकाशवाणी के एक छोटे से कमरे में मामूली से स्टूडियो और बहुत छोटे ट्रांसमीटर से हुई थी। तब इसे सिर्फ बीस किलोमीटर तक देखा जा सकता था और एक बहुत लंबा एंटिना लगाना पड़ता था जो कबूतरों के बैठने के काम भी आता था। यह वो जमाना था जब दूरदर्शन की सिर्फ परिकल्पना की गई थी और नियमित दैनिक प्रसारण तो दिल्ली में 1965 में और मुंबई तथा अमृतसर में 1972 में शुरू हुए। तब दूरदर्शन शाम को कुछ घंटे आता था, आकाशवाणी का हिस्सा था और समाचार का सिर्फ एक बुलेटिन था। 1976 में दूरदर्शन का अपना निदेशालय बनाया गया। यह वो जमाना था जब दूरदर्शन पर आने वाली सलमा सुल्तान और हेमा सहाय फिल्मी नायकों की तरह लोकप्रिय थे। यही हाल वी रमन और बाद में उमेश जोशी का था। दूरदर्शन अकेला चैनल था इसलिए उस पर जो दिखाया जाए वह एक मात्र विकल्प था। फिल्मी गानों पर आधारित चित्रहार जब दिखाया जाता था तो सड़के सूनी हो जाती थी। बहुत बाद में रामायण और महाभारत और हम लोग और बुनियाद जैसे धाराहिकों ने लगभग ऐसे ही चमत्कार किए। दूरदर्शन के एक धारावाहिक फौजी से निकल कर शाहरूख खान आज किंग खान बने हुए हैं। मगर दूरदर्शन जहां था, वहीं हैं। जैसा था, वैसा ही है। तब तक दूरदर्शन ब्लैक एंड व्हाइट ही था। दूरदर्शन का राष्ट्रीय प्रसारण 1982 में शुरू हुआ और राजीव गांधी की सलाह पर इंदिरा गांधी ने रंगीन प्रसारण भी शुरू किए क्योंकि उसी साल एशियन खेल होने वाले थे। रंगीन प्रसारण की शुरूआत 15 अगस्त 1982 को लाल किले से इंदिरा गांधी के भाषण के लाइव प्रसारण से हुई। आज तो दूरदर्शन के पूरे देश में चौदह सौ पार्थिव ट्रांसमीटर हैं और पचास से ज्यादा दूरदर्शन केंद्र है। भारत एक खोज जैसे कार्यक्रम अगर दूरदर्शन को गंभीरता के दायरे में लाए तो करमचंद्र जैसा जासूसी धारावाहिक पंकज कपूर को भी सितारा बना गया। उन्हीं दिनों दूरदर्शन पर हर इतवार को एक फीचर फिल्म दिखाई जाती थी और उसमें विज्ञापन नहीं के बराबर होते थे। आज की कहानी कुछ और है। दूरदर्शन के 19 चैनल हैं जिनमें से 11 क्षेत्रीय भाषाओं में हैं, एक खेल चैनल हैं। राज्यसभा और लोकसभा के लिए अलग अलग चैनल हैं और एक अंतराष्ट्रीय चैनल भी हैं। इसके अलावा अब तो दूरदर्शन डीटीएच यानी डिश सेवा भी चलाता है जो अच्छी खासी मांग में हैं और दूरदर्शन की कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा इसी से आता है। दिक्कत सिर्फ यह है कि प्रसार भारती नामक निगम के गठन और दूरदर्शन को तथाकथित तौर पर स्वायत्त कर देने के बावजूद न इसका चरित्र बदला और न चेहरा। इन दिनों नई दिल्ली के मंडी हाउस में दूरदर्शन का एक आधुनिक बहुमंजिला कार्यालय है लेकिन वहां भी कार्यक्रम मंजूर करवाने के लिए थोड़े बड़े पैमाने पर वहीं करना पड़ता है जो गैस कनेक्शन या राशन कार्ड बनवाने के लिए करना पड़ता है। दूरदर्शन के कई बड़े अधिकारी भ्रष्टाचार के आरोप में पकडे ग़ए हैं और उनसे करोड़ों रुपए बरामद हुए हैं। करोड़ों की कमाई प्राइवेट चैनल भी करते हैं मगर विज्ञापनों से करते हैं और कायदे से करते हैं। दूरदर्शन में तो निर्माता से कहा जाता है कि बजट बढ़ा कर लाओ और मंजूर होने के बाद इतना हिस्सा इसको दे दो। यही वजह है कि बहुत सारे परचुनिए, ढाबे वाले और इसी तरह के काम करने वाले न सिर्फ दूरदर्शन के नियमित निर्माता बन गए बल्कि उन्हीं के बनाए कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जाने लगी। अब थोड़ी कम जरूर हुई है मगर दूरदर्शन में दलाल संस्कृति अब भी मौजूद है। फैसले अब भी मंत्री और सचिव स्तर पर होते हैं और प्रसार भारती वाले खामोश बने रहते है क्योंकि उनकी नियुक्ति भी वहीं से होती है। एक किस्सा सुन लीजिए। एनडीए सरकार के दौरान एक दिन अचानक तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी दूरदर्शन देख रहे थे। शायद कृषि दर्शन कार्यक्रम था। लगभग पच्चीस मिनट का पूरा कार्यक्रम देखने के बाद देश के प्रधानमंत्री ने कहा कि ये लोग रहते किस दुनिया में हैं? कृषि क्षेत्र में दुनिया में इतनी सारी वैज्ञानिक शोध हो रही है लेकिन इन्हें दिखाने की फुरसत नहीं है। इसके बाद समाचार पर गए और वहां लगभग अंगड़ाई लेते हुए एक समाचार वाचक बता रहे थे कि किसी मंत्री ने अपने प्रदेश में विकास के लिए अधिकारियों की बैठक बुलाई और उनसे कहा कि उन्हें कर्तव्य पालन करना चाहिए। उन दिनों दूरदर्शन का समाचार चैनल आने को था। अटल जी ने यों ही पूछा कि इसका तुम कुछ कर सकते हो? मैंने भी यों ही जवाब दिया कि मौका मिले और आजादी मिले तो कुछ भी हो सकता है। देश के प्रधानमंत्री ने प्रसार भारती के तत्कालीन प्रमुख के एस शर्मा से फोन पर बात की और तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री रवि शंकर प्रसाद से कहा कि कल आलोक तोमर आपसे मिलने आएंगे और इनसे समाचार चैनल की बात कर लेना। रवि शंकर प्रसाद ने शास्त्री भवन में मिलने का वक्त दिया। हमारे और रवि शंकर के मित्र और प्रसिद्व वकील अमिताभ सिन्हा भी साथ में थे। उन्हें इसलिए ले लिया था क्योंकि बहुत साल पहले रवि शंकर प्रसाद के एक प्रेम प्रसंग में टांग अड़ा चुका था इसलिए पता नहीं था कि कैंसे पेश आएंगे? बात बड़े प्यार से हुई। रवि शंकर बोले कि आप तो सीधे हिमालय पर चढ़ गए। जरा जमीन पर आइए तो बात करें। अपन भी चुप रहने वाले नहीं थे। जवाब दिया कि अटल जी आपके लिए हिमालय होंगे लेकिन हमारे लिए तो जमीन भी वे ही है और आकाश भी। रवि शंकर प्रसाद ने चाय पिलाई, इधर उधर की बातें की, मेरे आज तक और दूसरे टीवी अनुभव के बारे में पूछा। इसके बाद मंत्रालय के तत्कालीन सचिव और वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला को बुला लिया। करेला और नीम चढ़ा। इन नवीन चावला के संजय गांधी मंडली से संपर्कों के बारे में कुछ ही दिन पहले लिख चुका था। मगर जैसे अफसर होते हैं, चावला ने गंभीर होने का पूरा अभिनय किया, कागज पर नोट भी करते गए और उठते हुए कहा- दूरदर्शन में आपका स्वागत है। यह उनसे मेरी आज तक की आखिरी मुलाकात थी। बाद में पता चला कि अपने मित्र दीपक चौरसिया समाचार चैनल के सलाहकार बन कर चले गए और बाद में उन्होंने मजाक में कहा भी कि जब राजनीति नहीं आती तो करते क्यों हो? जहां तक अटल जी का सवाल है तो बाद में भी उन्हाेंने इस बारे में न कुछ पूछा और न मैंने कुछ बताया। अपने इस अनुभव के बावजूद मेरा मानना है कि दूरदर्शन अपने आप में एक बड़ी ताकत है और भले ही वह सरकार का अंग हो, सरकार उसका बहुत बेहतर तरीके से और जनहित में इस्तेमाल कर सकती है। दूरदर्शन चलाना गोशाला चलाना नहीं है जहां चंदा वसूला जाता है और कश्मीर के विशेष चैनल कशीर के लिए प्रोग्रामिंग का जो लंगर बंटता है उसमें इस बार सौ से ज्यादा दुकानदार, टेक्सी ड्राइवर और इसी तरह के लोग प्रसाद पा गए हैं। पाकिस्तान टेलीविजन का मुकाबला इस चैनल को करना है मगर इस पर तो केसर के खेत, कश्मीरी नृत्य और डोगरी और सूफी साहित्य के कार्यक्रम चलते रहते हैं। जो दूरदर्शन विनोद दुआ, प्रणय रॉय और शाहरूख खान जैसे सितारे भारतीय सूचना अंतरिक्ष मेंं स्थापित कर सकता है वह अपनी विराट पहुंच के बावजूद अगर कुछ नहीं कर पा रहा तो क्यों नहीं कर पा रहा, इसका जवाब खुद दूरदर्शन वालों को ही देना होगा।
वकील करो-
वकील करो
वकील करो-
अपने हक के लिए लड़ो
नहीं तो जाओमरो
2
रटो, ऊँचे स्वर में,
बातें ऊँची-ऊँचीन सही दैनिक पत्रों से लेकर,
खादी के उजले मंचों सेदिन के,
तो रेस्तराओं-गोष्ठियों में हीउन्हें सुनाते पाये जाओ,
बड़े-बड़े नेताओं के नामगाते पाए जाओ!
फिरहो अगर हिम्मत तोडटो :
यानी-के चोर बाजार मेंअपनी
साखजमाओ खिलाओ हज़ारों, तोलाखों कमाओ!
और क्या, हाँ, फिरसट्टे-फ़स्ट क्लास होटेल-
ठेके-या कि एलेक्शन मेंपूंजी लगाओ,
और दो... ‘बड़े-बड़ों’ के बीच में बैठकर...
शान से मूँछों पर ताव!
हाँ, कानी उँगली पे अपनी गाँधी-टोपीनचाए,
नचाए, नचाए जाओ!
3
और आर्ट-क्या है ?
औरतकी जवानी केसौ बहाने :
उसकेसौ‘
फ़ॉर्म’:
जो उसपे झूमे,
अदा करोवही पार्ट :
-इसका भी एक बाज़ार हैसमझे न ?
ब्यूटी मार्ट
इसके माने:नये से नये मरोड़दोरंगों को अंगों कोजिस्म-
सीफिसलतीलाइनों कोसीने में घुलतेशेडों को
इसमें भी, खोजो तो,
गहरे से गहरेआदिमनशों का तोड़है,
समझे इस कला कीफ़िलासफ़ी?
इसी शराब केदौर चलाओ,
और ‘आगे’और ‘आगे’और ‘आगे’जाओ-जाओ !
और देश को ले जाओ(पता नहीं कहाँ !)
समझे, मेरेअत्याधुनिक भाई
वकील करो-
अपने हक के लिए लड़ो
नहीं तो जाओमरो
2
रटो, ऊँचे स्वर में,
बातें ऊँची-ऊँचीन सही दैनिक पत्रों से लेकर,
खादी के उजले मंचों सेदिन के,
तो रेस्तराओं-गोष्ठियों में हीउन्हें सुनाते पाये जाओ,
बड़े-बड़े नेताओं के नामगाते पाए जाओ!
फिरहो अगर हिम्मत तोडटो :
यानी-के चोर बाजार मेंअपनी
साखजमाओ खिलाओ हज़ारों, तोलाखों कमाओ!
और क्या, हाँ, फिरसट्टे-फ़स्ट क्लास होटेल-
ठेके-या कि एलेक्शन मेंपूंजी लगाओ,
और दो... ‘बड़े-बड़ों’ के बीच में बैठकर...
शान से मूँछों पर ताव!
हाँ, कानी उँगली पे अपनी गाँधी-टोपीनचाए,
नचाए, नचाए जाओ!
3
और आर्ट-क्या है ?
औरतकी जवानी केसौ बहाने :
उसकेसौ‘
फ़ॉर्म’:
जो उसपे झूमे,
अदा करोवही पार्ट :
-इसका भी एक बाज़ार हैसमझे न ?
ब्यूटी मार्ट
इसके माने:नये से नये मरोड़दोरंगों को अंगों कोजिस्म-
सीफिसलतीलाइनों कोसीने में घुलतेशेडों को
इसमें भी, खोजो तो,
गहरे से गहरेआदिमनशों का तोड़है,
समझे इस कला कीफ़िलासफ़ी?
इसी शराब केदौर चलाओ,
और ‘आगे’और ‘आगे’और ‘आगे’जाओ-जाओ !
और देश को ले जाओ(पता नहीं कहाँ !)
समझे, मेरेअत्याधुनिक भाई
मंगलवार, 23 नवंबर 2010

हासिम चाचा क्यूँ नही बता रहे है अयोध्या मसले का फार्मूला
अयोध्या राम जन्म भूमि के लिए कोर्ट द्वारा दिए गये फैश्ले को लेके पिछले ३० सितम्बर से पुरे देश के लोगो द्वारा अपने अपने विचार pais किये जा रहे है इन सब में जो सबसे जरुरी बात है ओ ए की बाबरी मस्जिद के पक्षकार हासिम अंसारी व हनुमानगढ़ी के महंथ ज्ञानदास की जुगल बंदी इन दोनों लोगो ने सुलह समझौते की बात की हवा बनाकर जो कुछ भी किया उसका पूरा देश स्वगत करता रहा और आज भी कर रहा है इनके इसी बात को लेकर अभी तक ग्रहमंत्री परधानमंत्री सभी सेकुलर समझे जाने वाले नेता यंहा तक की कई अभिनेता ने भी स्वागत किया बहुत अच्छा लगा की टीशर हिस्सा जो की अदालत ने मुसलमानों को दे दिया है और हिन्दू जिसके लिए दावे की बात कर रहे है सब कुछ ए दोनों संत मिलकर सुलझा लेंगे और सब कुछ अच्छा हो जायेगा इन दोनों लोगो की इस बात से एक उम्मीद जगी थी की शयद अब इस नाटक का यंही पटाक्षेप हो जायेगा पर आज तक कुछ नही हो पाया अलबत्ता अगर कुच्छ हुआ तो इसी भने रोज़ अखबारों में फोटो छापी खूब सम्मान हुआ आज भी हो रहा है पर इनसे फार्मूले की बात करो तो कुच्छ नही बताते न ही बाबा ज्ञानदास न ही हासिम चाचा कोई बात नही बत्यें भी क्यूँ अगर बता देंगे तो सची खुलने के बाद इतना सम्मान कान्हा मिलेगा क्यूंकि इन्हें भी पता है की न तो हिन्दू बाबा ज्ञानदास की बात मानने वाला है न ही मुसलमान हासिम चाचा की तो अच्छा यही होगा की पर्दा गिरा ही रहे
अयोध्या राम जन्म भूमि के लिए कोर्ट द्वारा दिए गये फैश्ले को लेके पिछले ३० सितम्बर से पुरे देश के लोगो द्वारा अपने अपने विचार pais किये जा रहे है इन सब में जो सबसे जरुरी बात है ओ ए की बाबरी मस्जिद के पक्षकार हासिम अंसारी व हनुमानगढ़ी के महंथ ज्ञानदास की जुगल बंदी इन दोनों लोगो ने सुलह समझौते की बात की हवा बनाकर जो कुछ भी किया उसका पूरा देश स्वगत करता रहा और आज भी कर रहा है इनके इसी बात को लेकर अभी तक ग्रहमंत्री परधानमंत्री सभी सेकुलर समझे जाने वाले नेता यंहा तक की कई अभिनेता ने भी स्वागत किया बहुत अच्छा लगा की टीशर हिस्सा जो की अदालत ने मुसलमानों को दे दिया है और हिन्दू जिसके लिए दावे की बात कर रहे है सब कुछ ए दोनों संत मिलकर सुलझा लेंगे और सब कुछ अच्छा हो जायेगा इन दोनों लोगो की इस बात से एक उम्मीद जगी थी की शयद अब इस नाटक का यंही पटाक्षेप हो जायेगा पर आज तक कुछ नही हो पाया अलबत्ता अगर कुच्छ हुआ तो इसी भने रोज़ अखबारों में फोटो छापी खूब सम्मान हुआ आज भी हो रहा है पर इनसे फार्मूले की बात करो तो कुच्छ नही बताते न ही बाबा ज्ञानदास न ही हासिम चाचा कोई बात नही बत्यें भी क्यूँ अगर बता देंगे तो सची खुलने के बाद इतना सम्मान कान्हा मिलेगा क्यूंकि इन्हें भी पता है की न तो हिन्दू बाबा ज्ञानदास की बात मानने वाला है न ही मुसलमान हासिम चाचा की तो अच्छा यही होगा की पर्दा गिरा ही रहे
बुधवार, 17 नवंबर 2010
राष्ट्रीय प्रेस दिवस मनाने का दुस्साहस
१६ नवम्बर को प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया के निर्देश पर पत्रिकारिता से जुड़े समूहों ने स्वच्छ और निष्पक्ष पत्रिकारिता के लिए राष्ट्रीय प्रेस दिवस का आयोजन किया इसी क्रम में फैजाबाद में भी फैजाबाद प्रेस क्लब ने इस अवसर पर मीडिया और चुनौतिया विषयक गोष्ठी का आयोजन किया था जिसका समय ११ बजे दिन में रखा गया था कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सहायक सुचना निदेशक चन्दन लाल चौधरी थे अध्यक्षता प्रेस क्लब के अध्यक्ष सुरेश पाठक को करना था यह सब फले से ही तय था की विषय गंभीर है तो इस में जादा से जादा पत्रकारों की bhagidari भी होनी cahiye .पर ऐसा हुआ नही पूरी गोष्ठी के दौरान १३ लोग मौजूद रहे जिसमे ६ वक्ता थे यानि की कुल ७ लोग उसमे भी दो नेता और समाजसेवी थे सही मायने में ५ पत्रकार इस अवसर पर सुनने के लिए रहे .जबकि इस पेसे से जुड़े लगभग १५० से जादा लोग खाली नगर में ही काम करते है पर सुचना के बाद भी नही आये कुछ लोगो को यद् आया शयद किसी ने फ़ोन कर कर कहा की कुछ खाने पीने का भी इंतजाम है तो कार्यक्रम ख़त्म होने पर ४-६ लोग और आ गये ऐसे में साफ़ सुथरी पत्रिकारिता की बात कौन सुनने वाला था क्या इतने कम लोगो को इतनी जरुरी बाते सुनाकर इस आयोजन का उद्देश्य पूरा हो गया नही .. सच तो ए है की ऐ सब बाते सुनने के लिए आज के पत्रकारों के पास टाइम ही नही है सुने भी क्योँ इससे कोई भी फायदा तो होने वाला नही था न तो वंहा कोई गिफ्ट मिलना था न ही धन का जुगाड़ तो कोई क्यूँ जाये ..फिर भी मई बधाई दूंगा कार्यक्रम के आयोजक प्रेस क्लब के लोगो को jinhone सब jan कर भी itna bada dusahs किया.
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