
यह सियासी वजहों से जुदा हुईं दो राजनीतिक शख्सियतों का पुनर्मिलन था। अलगाव के दौर में दोनों को अपनी टूटन का अहसास था। यही वजह थी कि गिले-शिकवे भुलाकर शनिवार को जब मुलायम सिंह यादव और मोहम्मद आजम खां एक साथ मंच पर आये तो दोनों की आवाजें भर्रायी और आंखें डबडबाई थीं। सियासी तन्हाई के संजीदा पलों में अपने नेता की जुदाई की बेकरारी को बयां करते हुए यदि भावुकता से आजम का गला रुंध गया तो उनकी तकरीर खत्म होने पर उन्हें गले लगाते हुए मुलायम सिंह की आखें भी छलछला गईं। भावनाओं के इस समुंदर में शेर-ओ-शायरी की लहरें भी हिलोरें मार रही थीं। तकरीर के माहिर आजम ने मुलायम से मुखातिब होकर कहा कभी खुशी से खुशी की तरफ नहीं देखा, तुम्हारे बाद किसी की तरफ नहीं देखा। यह सोच कर कि तेरा इंतजार लाजिम है, तमाम उम्र घड़ी की तरफ नहीं देखा। प्रदेश मुख्यालय में पार्टी के विभिन्न स्तर के पदाधिकारियों की जुटान में शामिल कार्यकर्ताओं को बखूबी अंदाज था कि बैठक को कलेवर चाहे कुछ भी दिया जाए, गुप्त एजेंडा मुलायम-आजम का मिलन ही है। पूर्वाह्न तकरीबन 11.15 बजे सपा कार्यालय में दाखिल हुई लालबत्ती लगी एम्बेस्डर कार से आजम का हाथ थामे मुलायम उतरे तो समूचा परिसर दोनों के जिंदाबाद के तुमुल घोष से गूंज उठा। आजम की वापसी को बेताब सपा खेमा उनके लिए किस कदर पलक पांवड़े बिछाये था, इसका अहसास मुलायम के छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने कराया। उन्होंने मंच से विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफे की घोषणा कर इस पद के लिए आजम के नाम की पेशकश कर दी। शिवपाल के इस विनम्र निवेदन के मर्म को समझते हुए भी आजम ने उनके लिखित इस्तीफे को मंच से यह कहकर फाड़ दिया कि अवाम नादान है, वह इस एलान का गलत मतलब निकालेगा।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें