शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010
धर्म के अखाडे
उत्सवों और पर्वों के लिए प्रसिद्ध भारतीय संस्कृति में चार माह तक चलनेवाला, कुम्भ पर्व सदियों से ‘भक्ति और आस्था’ का परम प्रतीक बना हुआ है। देश के चार प्रमुख तीर्थों पर बारह वर्ष के अंतराल पर यह विराट आयोजन होता है। प्राचीनकाल में देश के करोड़ों धर्मप्राण लोगों को इस तरह प्रत्येक तीसरे वर्ष भक्ति, दर्शन की परम्परा से जुड़ने और खुद में ज्ञान चेतना जगाने का अवसर मिलता था। कुम्भ के अवसरों पर प्रति तीसरे वर्ष करोड़ों लोगों का यह समागम सिर्फ धार्मिक निमित्त भर नहीं था बल्कि यह देश भर के सुदूर अंचलों में बसे विभिन्न कुटुम्बों के आपस में मिलने-जुलने, सुख-दुख की सूचनाएं साझा करने और विभिन्न समाजों की रीति-नीति को साझा करने का यह अवसर होता था। आज संचार के अत्याधुनिक साधन जो काम कर रहे हैं, वही काम सदियों पहले से कुम्भमेला करता रहा है। आज कुम्भ की पहचान दशनामी संन्यासियों के अखाड़े, शाही स्नान, साधुओं के डेरे और मठाधीशों-महामंडलेश्वरों का समागम है। हम यहां बात करते हैं कि आखिर क्या हैं ये अखाड़े और कैसी है दशनामियों की परम्परा?
भक्ति आंदोलन की शुरुआत दक्षिण भारत से मानी जाती है और महाराष्ट्र की संतबानी के जरिये यह उत्तर भारत पहुंची। यह वह दौर था, जब देश में विदेशी आक्रमण बढ़ने लगे थे। हिन्दु धर्म की ज्ञानमार्गी परम्परा शास्त्रार्थों और कर्मकांडों के जाल में उलझ चुकी थी और निम्नवर्ग पर तथाकथित धर्मप्रेरित अत्याचार बढ़ गए थे। इस ऐतिहासिक वक्त में इसी वर्ग से क्रान्ति चेतना पैदा हुई। दलित सन्तों ने अपनी निर्गुण आस्था की तरल-सरल धारा से समाज को राह दिखाई। यह वक्त बारहवीं सदी का था। इससे चार सदी पहले भी दक्षिण भारत में पैदा हुई, एक महान विभूति ने हिन्दू धर्म ध्वज फहराने के लिए एक विराट अभियान छेड़ा था। तत्कालीन भारत में बौद्ध धर्म की आंधी ने सनातन हिन्दू परम्परा के प्रति समाज की आस्था को हिला कर रख दिया था। हिन्दू धर्म की मान्यताओं, परम्पराओं में आ रही गिरावट को देखते हुए आदि शंकराचार्य ने ज्ञानमार्गी परम्परा को फनर्जीवित किया और अद्वैत दर्शन की मूल अवधारणा ‘बृह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ को स्थापित किया। इसके लिए उन्होने समूचे देश में अद्वैत और वेदांत का प्रसार किया। काशी के महान विद्वान मंडनमिश्र के साथ उनका शास्त्रार्थ, इस सिलसिले की महत्वपूर्ण कड़ी थी, जिसने उन्हें समूचे देश में धर्म दिग्विजयी के रूप में स्थापित कर दिया।
शंकराचार्य के सुधारवाद पर बौद्ध संस्कृति का असर भी है। विद्वानों ने इस असर को देखते हुए ही शंकराचार्य को प्रच्छन्न बौद्ध भी कहा है। दिलचस्प तथ्य है कि स्वामी विवेकानंद ने भी अमेरिका प्रवास के दौरान कहा था- ‘‘बुद्ध अपने ढंग से एक महा वेदांती थे। बौद्ध धर्म वेदांत की एक शाखा मात्र है। इसलिए शंकराचार्य को भी अनेक लोग प्रच्छन्न बौद्ध कहते हैं। बुद्ध ने विश्लेषण किया था, शंकर ने उसका संश्लेषण किया था। भारतीय संस्कृति में प्राचीनकाल से ही विभिन्न विचारधाराएं एक दूसरे पर असर डालती रही हैं। भिक्षु संघ, संघराम, विहार आदि के जरिये बौद्ध धर्म की समाज में महत्ता सिद्ध होती थी। शंकराचार्य ने इसी का अनुकरण कर प्राचीन आश्रम और मठ परम्परा में नए प्राण फूंके। शंकराचार्य ने अपना ध्यान संन्यास आश्रम पर केंद्रित किया और समूचे देश में दशनामी संन्यास परम्परा और अखाड़ों की नींव डाली।
दशनामी परम्परा:
आदि शंकराचार्य ने देश के चार कोनों में बौद्ध विहारों की तर्ज पर दक्षिण में श्रंगेरी, पूर्व में फरी, पश्चिम में द्वारका व उत्तर में बद्रीनाथ में मठ स्थापित किए, जिनका प्रबंध-संचालन विहारों की तरह ही होता था। शंकराचार्य ने संन्यासियों की दस श्रेणियां- ‘गिरी, फरी, भारती, सरस्वती, वन, अरण्य, पर्वत, सागर, तीर्थ और आश्रम’ बनाईं, जिसके चलते ये दशनामी संन्यास प्रचलित हुआ। दशनामियों के दो कार्यक्षेत्र निश्चित किए। पहला था- शस्त्र और दूसरा शास्त्र। गौरतलब है कि संन्यासियों की आदि-व्यवस्था, अद्वैतवाद और वेदांत दर्शन के संस्थापक महर्षि वेदव्यास के फत्र बालयोगी शुकदेव ने की थी। शुकदेव ने पिता से प्रेरित होकर यह कार्य किया था। पौराणिक काल से वह व्यवस्था चली आ रही थी, जिसका फनरुद्धार आदि शंकराचार्य ने दशनामी सम्प्रदाय बनाकर किया। सभी दशनामी शैवमत में दीक्षित हैं। दशनामी साधुओं के दो कर्तव्य शंकराचार्य ने निश्चित किए। पहला, वे शास्त्र-प्रवीण हों, ताकि धर्म-परम्परा विस्मृत समाज को दिशा मिल सके, दूसरा वे शस्त्र-प्रवीण हों ताकि विदेशी आक्रमणकारियों से देश की रक्षा हो सके। यह भी कहा जाता है कि शंकराचार्य के सुधारवाद का तत्कालीन समाज में खूब विरोध भी हुआ था और साधु समाज को उग्र और हिंसक साम्प्रदायिक विरोध से जूझना पड़ता था। काफी सोच-विचार के बाद शंकराचार्य ने वनवासी समाज को दशनामी परम्परा से जोड़ा, ताकि उग्र विरोध का सामना किया जा सके। वनवासी समाज के लोग अपनी रक्षा करने में समर्थ थे, और शस्त्र प्रवीण भी। इन्हीं शस्त्रधारी वनवासियों की जमात नागा साधुओं के रूप में सामने आई।
गौरतलब है कि जैन और बौद्ध धर्म भी सनातन हिन्दू परम्परा से ही निकले थे। इन दोनों धाराओं के चिन्तन और शब्दावली पर यह असर साफ दिखता है। इसी तरह जब शंकर ने हिन्दू धर्म के अभ्युदय का बीड़ा उठाया तब बौद्धधर्म की तूती बोल रही थी। जाहिर है शंकर के सुधारवाद पर बौद्ध असर दिखना ही था। यह असर शैली और शब्दावली दोनों पर पड़ा। शंकराचार्य ने दशनामी परम्परा को महाम्नाय के अनुशासन से बांधा। आम्नाय का अर्थ है रीति, वैदिक ज्ञान, फण्य-प्रेरित ज्ञान, कुल तथा राष्ट्र की परम्पराएं। जैन तथा बौद्ध दर्शन में भी आम्नाय शब्द का खूब प्रयोग हुआ है। चारों दिशाओं में स्थापित मठों को जब महाम्नाय अर्थात सनातन हिन्दुत्व की नवोन्मेषी धारा से बांधा गया, तो उसे मठाम्नाय कहा गया। इन्हीं मठाम्नायों के साथ दशनामी संन्यासी संयुक्त हुए। वन, अरण्य, नामधारी संन्यासी उड़ीसा के जगन्नाथफरी स्थित गोवर्धन पीठ से संयुक्त हुए। पश्चिम में द्वारिकाफरी स्थित शारदपीठ के साथ तीर्थ एव आश्रम नामधारी संन्यासियों को जोड़ा गया। उत्तर स्थित बद्रीनाथ के ज्योतिर्पीठ के साथ गिरी, पर्वत और सागर नामधारी संन्यासी जुड़े, तो सरस्वती, फरी और भारती नामधारियों को दक्षिण के श्रृंगेरी मठ के साथ जोड़ा गया।
सैनिक संन्यासियों का स्वरूप:
इन मठाम्नायों के साथ अखाड़ों की परम्परा भी लगभग इनकी स्थापना के समय से ही जुड़ गई थी। चारों पीठों की देशभर में उपपीठ स्थापित हुई। कई शाखाएं-प्रशाखाएं बनीं, जहां धूनि, मढ़ी अथवा अखाड़े जैसी व्यवस्थाएं बनीं। जिनके जरिए, स्वयं संन्यासी पोथी, चोला का मोह छोड़ कर, थोड़े समय के लिए शस्त्रविद्या सीखते थे, साथ ही आमजन को भी इन अखाड़ों के जरिये आत्मरक्षा (प्रकारांतर से धर्मरक्षाश् के लिए सामरिक कलाएं सिखाते थे। इस तरह अखाड़ों के जरिए धर्मरक्षक सेना का एक स्वरूप बनता चला गया। हिन्दूधर्म को इस्लाम की आंधी से बचाने के लिए सिख पंथ एक सामरिक संगठन के तौर पर ही सामने आया था। इसके महान गुरुओं ने अध्यात्म की रोशनी में लोगों को धर्मरक्षा के लिए शस्त्र उठाने की प्रेरणा दी। अखाड़ों का यह स्वरूप प्रायः हर धर्म-सम्प्रदाय में रहा है। दुनियाभर के धार्मिक आंदोलनों के साथ अखाड़ा अर्थात आत्मरक्षा से जुड़ी तकनीक को ध्यान-प्राणायाम से जोड़कर अपनाया गया। हर धार्मिक सम्प्रदाय के साथ शस्त्रधारी रहे हैं और धर्म या पंथ अथवा मठ पर आए खतरों का सामना इन्होंने किया है। बौद्ध धर्म चीन तक पहुंचाने का श्रेय पांचवीं सदी के जिन आचार्य बोधिधर्म को दिया जाता है उन्हें ही चीन की प्रसिद्ध मार्शल आर्ट शैलियों को विकसित करने का श्रेय दिया जाता है। अहिंसक धर्म के आचार्य ने मूलतः ध्यान केन्द्रित करने की तकनीक के तौर पर इस कला को जन्म दिया, जिसे बाद में आत्मरक्षा की कला के तौर पर मान्यता दे दी गई। गौरतलब है कि ध्यान ही जापान पहुंच कर जेन या जिन कहलाया।
मध्यकाल मे चारों पीठों से जुड़ी दर्जनों पीठिकाएं सामने आईं, जिन्हें मठिका कहा गया। इसका देशज रूप मढ़ी प्रसिद्ध हुआ। देशभर में दशनामियों की ऐसी कुल 52 मढ़ियां हैं, जो चारों पीठों द्वारा नियंत्रित हैं। इनमें सर्वाधिक 27 मठिकाएं गिरि दशनामियों की हैं, 16 मठिकाओं में फरी नामधारी संन्यासी काबिज हैं, 4 मढ़ियों में भारती नामधारी दशनामियों का वर्चस्व है और एक मढ़ी लामाओं की है। साधुओं में दंडी और गोसाईं दो प्रमुख भेद भी हैं। तीर्थ, आश्रम, भारती और सरस्वती दशनामी, दंडधर साधुओं की श्रेणी में आते हैं जबकि बाकी गोसाईं कहलाते हैं।
अखाड़ों की शुरुआत:
हिन्दुओं की आश्रम परम्परा के साथ अखाड़ों का अस्तित्व, यूं तो प्राचीनकाल से ही रहा है। अखाड़ों का आज जो स्वरूप है उस रूप में पहला अखाड़ा ‘अखंड आह्वान अखाड़ा’ सन् 547 ई. में सामने आया। इसका मुख्य कार्यालय काशी में है और शाखाएं सभी कुम्भ तीर्थों पर हैं। अखाड़ा शब्द के मूल में अखंड शब्द को भी देखा जाता है। कालांतर में अखंड का देशज रूप अखाड़ा हुआ। हालांकि भाषाशास्त्र की दृष्टि से अखाड़ा की यह व्युत्पत्ति सही नहीं है।
आज जो अखाड़े प्रचलन में हैं उनकी शुरूआत चौदहवी सदी से मानी जाती है। वर्तमान में हरिद्वार के कुम्भ में शाही स्नान के क्रम में प्रसिद्ध सात शैव अखाड़ों में श्रीपंचायती तपोनिधि निरंजनी अखाड़ा, श्रीपंचायती आनंद अखाड़ा, श्रीपंचायती दशनामी जूना अखाड़ा, श्रीपंचायती आवाहन अखाड़ा, श्रीपंचायती अग्नि अखाड़ा, श्रीपंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा और श्रीपंचायती अटल अखाड़ा हैं। वैष्णव साधुओं के अखाड़ों के बाद कुछ अन्य अखाड़े भी आते हैं। गुरु नानकदेव के फत्र श्रीचंद ने उदासीन सम्प्रदाय चलाया था। इसके दो अखाडे़, श्रीपंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा और श्रीपंचायती नया उदासीन अखाड़ा भी सामने आए। इसी तरह सिखों की एक पृथक जमात निर्मल सम्प्रदाय का श्रीपंचायती निर्मल अखाड़ा भी अस्तित्व में आया।
पहले सिर्फ, शैव साधुओं के अखाड़े होते थे। बाद में वैष्णव साधुओं में भी अखाड़ा परम्परा शुरू हुई। शैव जमात के सात अखाड़ों के बाद वैष्णव बैरागियों के तीन खास अखाड़े हैं- श्री निर्वाणी अखाड़ा, श्रीनिर्मोही अखाड़ा और श्रीदिगंबर अखाड़ा। शैवों और वैष्णवों में शुरू से संघर्ष रहा है। शाही स्नान के वक्त अखाड़ों की आपसी तनातनी और साधु-सम्प्रदायों के टकराव खूनी संघर्ष में बदलते रहे हैं। हरिद्वार कुंभ में तो ऐसा अनेक बार हुआ है। वर्ष 1310 के महाकुंभ में महानिर्वाणी अखाड़े और रामानंद वैष्णवों के बीच हुए झगड़े ने खूनी संघर्ष का रूप ले लिया था। वर्ष 1398 के अर्धकुंभ में तो तैमूर लंग के आक्रमण से कई जानें गई थीं। वर्ष 1760 में शैव संन्यासियों व वैष्णव बैरागियों के बीच संघर्ष हुआ था। 1796 के कुम्भ में शैव संन्यासी और निर्मल संप्रदाय आपस में भिड़ गए थे। विभिन्न धार्मिक समागमों और खासकर कुम्भ मेलों के अवसर पर साधु संगतों के झगड़ों और खूनी टकराव की बढ़ती घटनाओं से बचने के लिए अखाड़ा परिषद की स्थापना की गई, जो सरकार से मान्यता प्राप्त है। इसमें कुल मिलाकर उक्त तेरह अखाड़ों को शामिल किया गया है। प्रत्येक कुम्भ में शाही स्नान के दौरान इनका क्रम तय है।
भाषा विज्ञान की दृष्टि में अखाड़ा:
अखाड़ा, यूं तो कुश्ती से जुड़ा हुआ शब्द है, मगर जहां भी दांव-पेंच की गुंजाइश होती है, वहां इसका प्रयोग भी होता है। आज की ही तरह प्राचीनकाल में भी शासन की तरफ से एक निर्धारित स्थान पर जुआ खिलाने का प्रबंध रहता था, जिसे अक्षवाटः कहते थे। अक्षवाटः बना है दो शब्दों अक्ष और वाटः से मिलकर ।
अक्ष के कई अर्थ हैं, जिनमें एक अर्थ है चौसर या चौपड़, अथवा उसके पासे। वाटः का अर्थ होता है घिरा हुआ स्थान। यह बना है संस्कृत धातु वट् से जिसके तहत घेरना, गोलाकार करना आदि भाव आते हैं। इससे ही बना है उद्यान के अर्थ में वाटिका जैसा शब्द। चौपड़ या चौरस जगह के लिए बने वाड़ा जैसे शब्द के पीछे भी यही वट् धातु झांक रही है। इसी तरह वाटः का एक रूप बाड़ा भी हुआ, जिसका अर्थ भी घिरा हुआ स्थान है। वर्ण विस्तार से कहीं-कहीं इसे बागड़ भी बोला जाता है। इस तरह देखा जाए तो, अक्षवाटः का अर्थ हुआ जहां पर पासों का खेल खेला जाए। जाहिर है कि पासों से खेला जाने वाला खेल जुआ ही है सो अक्षवाटः का अर्थ हुआ, ‘द्यूतगृह अर्थात जुआघर।’ अखाड़ा शब्द कुछ यूं बना- अक्षवाटः अक्खाडअ, अक्खाडा, अखाड़ा। द्यूतगृह जब अखाड़ा कहलाने लगा और खेल के दांव-पेंच से ज्यादा महत्व हार-जीत का हो गया तो नियम भी बदलने लगे। अब दांव पर रकम ही नहीं, कुछ भी लगाया जाने लगा। महाभारत का द्यूत-प्रसंग सबको पता है। इसी तरह अखाड़े में वे सब शारीरिक क्रियाएं भी आ गईं, जिन्हें क्रीड़ा की संज्ञा दी जा सकती थी और जिन पर दांव लगाया जा सकता था। जाहिर है प्रभावशाली लोगों के बीच आन-बान की नकली लड़ाई के लिए कुश्ती, इनमें सबसे खास शगल था, सो धीरे-धीरे कुश्ती का बाड़ा अखाड़ा कहलाने लगा और जुआघर को अखाड़ा कहने का चलन खत्म हो गया। अब तो व्यायामशाला को भी अखाड़ा कहते हैं और साधु-संन्यासियों के मठ या रुकने के स्थान को भी अखाड़ा कहा जाता है। कहां जुआ खेलने की जगह और कहां साधु-संन्यासियों की संगत।
भ्रष्टाचार लाइलाज नहीं
लेकिन क्या भ्रष्टाचार केवल हमारी राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में ही व्याप्त है? मेरा अनुभव कहता है, नहीं। इनके बाहर जो हमारे व्यावसायिक समूह है, उनमें भी भ्रष्टाचार के अनेक उदाहरण हमने देखे हैं। हर्षद मेहता, केतन पारीख से जुड़े स्कैण्डल किसकी देन हैं? कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है कि मानो भ्रष्टाचार हम भारतीयों के मन में एक स्वीकृत परिदृश्य बनकर गहरी पैठ कर चुका है। शायद ही जीवन का कोई क्षेत्र इसकी पकड़ से बाहर हो।
भ्रष्टाचार केवल नैतिकता पर प्रश्न नहीं है बल्कि यह भारत जैसे गरीब किन्तु विकासशील देश की आर्थिक उन्नति में सबसे बड़ी बाधा है। बहुत सारे अर्थशास्त्री मानते हैं कि भ्रष्टाचार की जड़ में हमारे राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी हैं। अधिकांश बड़ी-बड़ी परियोजनाएं इन्हीं लोगों के दिमाग की उपज होती हैं। जनता के स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण के नाम पर बनने वाली परियोजनाओं में जबर्दस्त भ्रष्टाचार होता है। नकली दवाएं, विद्यालयों की जर्जर इमारतें, अयोग्य अध्यापक और स्तरहीन भोजन-व्यवस्था देकर आखिर किस तरह गरीबों का, इस देश का भला किया जा सकता है? शायद इसीलिए प्रख्यात अर्थशास्त्री विमल जालान का यह कहना उपयुक्त है कि भ्रष्टाचार पहले से ही गैर-बराबरी वाले समाज में असमानता को बढ़ाता है।
भ्रष्टाचार का प्रभाव हमारे उद्यमों पर भी होता ही है। मध्यम श्रेणी के, लघु श्रेणी के उद्योग जहां इससे प्रभावित होते हैं, वहीं बड़े औद्योगिक समूह भ्रष्टाचार के द्वारा बाजार में अपना एकाधिकार और वर्चस्व कायम करने की होड़ करते हैं।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भ्रष्टाचार जहां हमारी प्रगति, उत्पादकता को नुकसान पहुंचाता है, वहीं इससे निवेश भी हतोत्साहित होता है, आर्थिक हानि के साथ लोगों का व्यवस्था पर से विश्वास टूटता है। यदि हमारे देश में भ्रष्टाचार पर शुरू में ही लगाम लगाई जाती, तो सम्भवत: 80-90 के दशक में ही हमने 8 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर प्राप्त कर ली होती, जो आज 6.1 प्रतिशत तक ही पहुंच सकी है।
आज लोग निराश हैं, सोचते हैं भ्रष्टाचार अब खत्म नहीं हो सकता, पर मैं उनमें नहीं हूं। मुझे भारत के उज्ज्वल भविष्य में पूरी आस्था है। भ्रष्टाचार समाप्त करना है तो पहल उन लोगों से शुरू होनी चाहिए जो ऊंचे स्थानों पर बैठे हैं, जिन पर समाज ने, देश ने अपनी देखभाल का दायित्व सौंपा है। हमारे राजनेताओं, प्रशासकों और उद्यमियों को मिल-जुलकर इस मुसीबत से पार पाना है। सबसे पहले हमें प्रेरक, नि:स्वार्थ और साहसी नेतृत्व चाहिए। सच्चाई, पारदर्शिता और दायित्व निर्वहन के द्वारा नेतृत्व सरकार और समाज में आत्मविश्वास पैदा करता है। दुर्भाग्यवश, आज यह स्थिति नहीं है। जरूरत इस बात की है कि हम भ्रष्टाचारी को त्वरित ढंग से दण्ड देने की व्यवस्था करें। ऐसा वातावरण बने कि अभी भी ईमानदारी की कद्र है और ऐसा करने के लिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उदाहरण चाहिए। भ्रष्टाचार में आरोपित व्यक्ति, चाहे कोई भी क्यों न हो, उसे किसी दायित्व पर तब तक नहीं रखा जाना चाहिए जब तक कि वह खुद को निर्दोष साबित न कर ले। त्वरित और कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए। यदि ऊंचे पदों पर बैठे गलत तत्वों पर कारवाई हो तो हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक संदेश दे सकेंगे। पर आज तो वातावरण ऐसा है कि भ्रष्टाचार को वैश्विक परिदृश्य का अंग बताकर इसे हमारे सामाजिक जीवन की अनिवार्यता सिद्ध किया जा रहा है। वस्तुत: हमारे राजनीतिक वर्ग और प्रशासनिक वर्ग के विरुद्ध जब भ्रष्टाचार के मामले में शिथिलता बरती जाती है, तो स्वभाविक ही समाज में संदेश चला जाता है कि ऊंचे बनने के लिए भ्रष्ट तरीके अपनाने मे कोई हर्ज नहीं है।
हमारे प्रशासनिक अधिकारी बड़ी संख्या में ईमानदार रहते हैं, लेकिन धीरे-धीरे भ्रष्टाचार के मकड़जाल में उलझ जाते हैं। कैसे उलझते हैं, इससे संबंधित एक घटना मुझे याद है। सन् 1980 के दशक के मध्य में एक बार मैं दिल्ली आया हुआ था। एक शाम को होटल अशोक के यात्री निवास में डिनर पर मेरी मुलाकात मेरे एक मित्र से हुई। केन्द्र सरकार के मंत्रालयों में उसकी गिनती एक ईमानदार और स्वच्छ चरित्र वाले आफिसर के रूप में थी। भोजन के समय मैंने उसे कुछ चिंतित पाया। बातचीत में उसने अपनी तकलीफ मुझे बताई। उसने बताया कि जीवन में पहली बार आज उसने एक केस में रिश्वत ली है और तब से ही एक प्रकार की बेचैनी मुझे परेशान किए है। मैंने कहा कि रिश्वत लेना तो गलत है, इसमें कोई संशय नहीं है। और तब उसने मुझे जो कहा, सुनकर मुझे धक्का लगा। उसने कहा कि मेरे विचारों का एक हिस्सा इस कार्य को उचित ठहराता है क्योंकि मैंने अपने मंत्री को रिश्वत लेते हुए देखा है। मैं अपने उस मित्र की मन:स्थिति समझ सकता था। मुझे वह कारण समझ में आ गया कि क्यों हमारे अच्छे-भले, उत्साही प्रशासनिक अधिकारी धीरे-धीरे इस मकड़जाल में उलझते जाते हैं। लेकिन मैं यह भी कहूंगा कि जिन्हें देश-समाज को दिशा देनी है, नेतृत्व देना है, वे इस प्रकार की उलझनों में नहीं फंसते। अनैतिकता को आखिर किस तर्क से नैतिकता का जामा पहनाया जा सकता है?
सिंगापुर में सन् 80 के दशक में एक घटना घटित हुई थी। भ्रष्टाचार के आरोप में घिरे एक मंत्री के विरुद्ध जांच में आरोप को प्रथम दृष्टया सही पाया गया। उस मंत्री ने प्रधानमंत्री से स्वयं को निर्दोष बताते हुए हस्तक्षेप की गुहार लगाई। प्रधानमंत्री ने उस मंत्री को स्पष्ट कहा कि आपका काम खत्म हो चुका है। इस मामले में कड़ी कार्रवाई होगी और अब आगे चुनाव लड़ने का ख्वाब देखना भी छोड़ दीजिए। अपने नेता की बात सुनकर वह मंत्री घर चला गया। अगले दिन समाचार पत्रों द्वारा पूरे सिंगापुर को खबर लगी कि उस मंत्री ने स्वयं ही सिर पर गोली मारकर आत्महत्या कर ली। तो यह है वह संदेश, जिससे भ्रष्टाचार रुकता है, रुक सकता है। भ्रष्टाचारी व्यक्ति को कदापि कहीं से भी संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
हमारे कार्यों में पारदर्शिता झलकनी चाहिए। भ्रष्टाचार समाप्त करने का एक तरीका यह भी है कि हम अपने चुनाव में खर्च होने वाले धन पर भी नियंत्रण करें। इस बारे में हम जर्मनी का उदाहरण ले सकते है। वहां प्रत्येक प्रत्याशी पर खर्च होने वाले धन के बारे में जनता को जानकारी दी जाती है कि इतना पैसा प्रत्याशी ने कहां से जुटाया। हमें इसी के साथ ऐसा तंत्र भी विकसित करना पड़ेगा जो धन के अतिगमन पर न केवल नजर रखे वरन् जरूरत पड़ने पर तत्काल कार्रवाई भी कर सके। इस सन्दर्भ में चुनाव आयोग को और शक्तिसम्पन्न किया जाना चाहिए। प्रत्येक प्रत्याशी के अनाधिकृत और भ्रष्ट कार्यों को व्यापक रूप में प्रकाशित कर जनता को उससे अवगत कराना आवश्यक है। इस संदर्भ में त्रिलोचन शास्त्री और उनके सहयोगियों के चलते उठाए गए कदम का पूरे देश में अच्छा संदेश गया है।
प्रशासनिक भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए ऐसे बहुत से कार्यों को, उपायों को तलाशने की जरूरत है, जिनमें सरकार की कोई भूमिका नहीं है। जैसे जब सरकार ने कम्प्यूटरों का आयात करने के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता समाप्त कर दी, इलेक्ट्रॉनिक विभाग में फैला भष्टाचार एक ही झटके में समाप्त हो गया। सरकार की प्रवृत्ति कुछ ऐसी हो गई है कि वह जितनी नई योजनाएं बनाती है, प्रत्येक में सरकारी स्वीकृति प्राप्त करने के लिए व्यवसायियों को भारी कशमकश का सामना करना पड़ता है। हमें प्रत्येक क्षेत्र में भ्रष्टाचार की छोटी से छोटी संभावना का ध्यान रखकर उसे मिटाने के उपाय करने होंगे।
भ्रष्टाचार को दूर करने का एक बड़ा उपाय हमें ई-गवर्नेंस के रूप में मिल गया है। ई-गवर्नेंस ने निर्णय प्रक्रिया और निर्णय के क्रियान्वयन को भी अत्यंत आसान कर दिया है। हमें अपनी निर्णय-प्रक्रिया में अधिकाधिक पारदर्शिता रखनी होगी और इस कार्य में यदि हम साफ्टवेयर का इस्तेमाल सहज क्रियाशीलता के साथ प्रत्येक महत्वपूर्ण निर्णय-प्रक्रिया में करते हैं तो मैं मानता हूं कि इससे सरकारी कार्यों और निर्णयों में पर्याप्त चुस्ती आएगी और भ्रष्टाचार की सम्भावनाएं भी समाप्त हो जाएंगी। ई-गवर्नेंस न केवल सेवाओं को सहज-सुलभ बनाता है बल्कि इससे यह पता लगाना भी आसान है कि कहां पर निर्णय या उसके क्रियान्वयन में देरी हो रही है।
हैदराबाद के ई-सेवा केन्द्रों ने साधारण जनता की कठिनाइयों को जिस तरह दूर किया है, वह इस सन्दर्भ में एक प्रेरक उदाहरण है। सरकारी कार्यों से इसके चलते भ्रष्टाचार भी समाप्त हुआ है। सरकार की उपयोगी सेवाओं, विविध प्रमाण पत्रों, सरकारी अभिलेखों, अनुपत्रों, और तो और प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफ.आई.आर.) के लिए देय शुल्क का भुगतान भी अब इसी माध्यम से होने लगा है।
आज हमें उत्तरदायी प्रशासन चाहिए। सरकारी कार्यों में गलती, लापरवाही और भ्रष्टाचार करने वालों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए। दुर्भाग्यवश हमारे देश के अधिकांश लोकायुक्त असफल हो चुके हैं, क्योंकि एक तो उन्हें सरकार के अन्तर्गत कार्य करना पड़ता है, दूसरे उनके कार्मिकों की गुणवत्ता भी बेहतर नहीं है। हमें अब एक अलग ज्यूरी खड़ी करनी होगी जो न्यायिक शक्तियों के साथ हमारी न्याय व्यवस्था के अंग के रूप में सिर्फ भ्रष्टाचार के मामलों से निपटने के लिए त्वरित रूप में काम करे। इन्हें प्रशासकों और सरकारों के अन्तर्गत न रखकर केवल संसद के प्रति उत्तरदायी बनाना होगा। साथ ही, ज्यूरी द्वारा निर्णीत मामलों में उच्च स्तर पर सुनवाई का अवसर भी निषिद्ध करना होगा।
मैं कहना चाहूंगा कि केन्द्रीय जांच ब्यूरो भी इस संदर्भ में अपने हाथ में लिए गए मामलों मे जिस तत्परता से कार्रवाई करनी चाहिए, उसमें सफल नहीं हुआ है। केन्द्रीय जांच ब्यूरो के वर्तमान ढांचे में परिवर्तन कर उसमें तेज-तर्रार अफसरों की नियुक्ति की जानी चाहिए। केन्द्रीय जांच ब्यूरो को किसी केस के बारे में प्राथमिक तथ्यों का अन्वेषण बारीकी से करके उस पर आगे कदम बढ़ाना चाहिए।
देश के औद्योगिक जगत, उद्यमी समूहों पर भी भ्रष्टाचार खत्म करने का दायित्व है। इन्फोसिस कम्पनी में हमने मूल्यों के क्षरण को रोकने के लिए इसी सन्दर्भ में एक कदम उठाया था। हमारे एक वरिष्ठ सहयोगी ने जब हमारी मूल्य-परंपरा के विपरीत काम किया तो हमें निर्णय लेने में मात्र कुछ घण्टे लगे और उनका त्यागपत्र ले लिया गया। आज देश को दृढ़ निश्चयी और सुयोग्य नेतृत्व जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में चाहिए। ऐसे लोग हैं भी, बस जनता में विश्वास और कुछ करने का वातावरण बन जाए, तो हम सब कुछ ठीक कर लेंगे।
भ्रष्टाचार का दलन करना होगा ..
जो भी व्यक्ति इस संगठन से जुडना चाहे उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्त करने के लिये निम्न पते पर लिखें या फोन पर बात करें :
डॉ। पुरुषोत्तम मीणा,
राष्ट्रीय अध्यक्षभ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in
गुरुवार, 16 दिसंबर 2010
मैं मुसलमान तु्म क़ाफ़िर
किन्तु श्री अशफाक उल्ला खां ने इस धारणा को मिथ्या साबित कर दिया । उनका हृदय बड़ा विशाल और विचार बड़े उदार थे । अन्य मुसलमानों की भांति मैं मुसलमान वह काफिर आदि के संकीर्ण भाव उनके हृदय में घुसने ही नहीं पाये । सब के साथ सम व्यवहार करना उनका सहज स्वभाव था । निर्द्वँदता, लगन, दृढ़ता, प्रसन्नता, उनके स्वभाव के विशेष गुण थे ।
वे कविता भी करते थे । उन्होंने बहुत ही अच्छी-अच्छी कवितायें, जो स्वदेशानुराग से सराबोर हैं, बनाई है । कविता में वे अपना उपनाम हसरत लिखते थे । वे अपनी कविताओं को प्रकाशित कराने की चेष्टा नहीं करते थे । कहते-हमें नाम पैदा करना तो है नहीं । अगर नाम पैदा करना होता तो क्रान्तिकारी काम छोड़ लीडरी न करता ? आपकी बनाई हुई कविताएं अदालत आते-जाते अक्सर काकोरी के अभियुक्त गाया करते थे ।
श्री अशफाक उल्ला खां वारसी हसरत ‘शाहजहांपुर के रहने वाले थे । इनके खानदान के सभी लोग को शुमार वहां के रईसों में है । बचपन में इनका मन पढ़ने लिखने में न लगता था । खनौत में तैरने, घोड़े की सवारी करने और भाई की बन्दूक लेकर शिकार करने में इन्हें बड़ा आनन्द आता था । बड़े सुडौल, सुन्दर और स्वस्थ जवान थे । चेहरा हमेशा खिला हुआ और बोली प्रेम में सनी हुई बोलते थे । ऐसे हटटे-कटटे सुन्दर नौजवान बहुत कम देख पड़ते है ।
बचपन से ही उनमें स्वदेशानुराग था । देश की भलाई के लिये किये जाने वाले आन्दोलनों की कथायें वे बड़ी रूचि से पड़ते थे । धीरे-धीरे उनमें क्रान्तिकारी भाव पैदा हुए । उनको बड़ी उत्सुकता हुई कि किसी ऐसे आदमी से भेंट हो जाये जो क्रान्तिकारी दल का सदस्य हो । उस समय मैनपुरी षड़यन्त्र का मामला चल रहा था । वे शाहजहांपुर में स्कूल में शिक्षा पाते थे । मैनपुरी षड़यन्त्र में शाहजहांपुर के ही रहने वाले एक नवयुवक के नाम भी वारण्ट निकला । वह नवयुवक और कोई न था, श्री रामप्रसाद बिस्मिल थे । श्री अशफाक को यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि उनके शहर में ही एक आदमी है जैसा कि वे चाहते है । किन्तु मामले से बचने के लिये श्री रामप्रसाद भगे हुए थे । जब शाही ऐलान द्वारा सब राजनैतिक कैदी छोड़ दिये गये, तब श्री रामप्रसाद शाहजहांपुर आये ।
श्री अशफाक को यह बात मालूम हुई । उन्होंने मिलने की कोशिश की । उनसे मिलकर षड़यन्त्र के सम्बन्ध में बातचीत करनी चाही । पहले तो श्री रामप्रसाद ने टालमटूल कर दी । परन्तु फिर उनके श्री अशफाक के व्यवहार और बर्ताव से वह इतने प्रसन्न हुए कि उनको अपना बहुत ही घनिष्ट मित्र बना लिया । इस प्रकार वे क्रान्तिकारी जीवन में आये । क्रान्तिकारी जीवन में पदार्पण करने के बाद से वह सदा प्रयत्न करते रहे कि उनकी भांति और मुसलमान नवयुवक भी क्रान्तिकारी दल के सदस्य बने । हिन्दु-मुसलिम एकता के वे बड़े कटटर हामी थी ।
उनके निकट मंदिर और मसजिद एक समान थे एक बार जब शाहजहांपुर में हिन्दू और मुसलमानों में झगड़ा हुआ और शहर में मारपीट शुरु हो गई उस समय आप बिस्मिल जी के साथ आर्य समाज मन्दिर में बैठे हुए थे । कुछ मुसलमान मन्दिर के पास आ गए और आक्रमण करने के वास्ते तैयार हो गएं । आपने अपना पिस्तौल फौरन निकाल लिया । और आर्य समाज मन्दिर से बाहर आकर मुसलमानों से कहने लगे कि मैं कटटर मुसलमान हूं परन्तु इस मन्दिर की एक-एक ईंट मुझे प्राणों से प्यारी है । मेरे नजदीक मन्दिर और मसजिद प्रतिष्ठा बराबर है । अगर किसी ने इस मन्दिर की ओर निगाह उठाई तो गोली का निशाना बनेगा । अगर तुमको लड़ना है तो बाहर सड़क पर चले जाओ और खूब दिल खोल कर लड़ लो । उनकी इस सिंह गर्जना को सुन कर सब के होश हवास गुम हो गए । और किसी का साहस न हुआ जो आर्य समाज मन्दिर पर आक्रमण करे सारे के सारे इधर उधर खिसक गए । यह तो उनका सार्वजनिक प्रेम था । इस से भी अधिक आपको बिस्मिल जी से प्रेम था
एक समय की बात है आपकी बीमारी के कारण दौरा आ गया । उस समय आप राम-राम कह के पुकारने लगे । माता-पिता ने बहुतेरा कहा कि तुम मुसलमान हो खुदा-खुदा कहो, परन्तु उस प्रेम के सच्चे पुजारी के कान में यह आवाज ही नहीं पहुंची और वह बराबर राम-राम कहता रहा । माता-पिता तथा अन्य सम्बन्धियों की समझ में यह बात न आई । उसी समय एक अन्य व्यक्ति ने आकर उन के सम्बन्धियों से हा कि यह राम प्रसाद बिस्मिल को याद कर रहे है । यह एक दूसरे को राम और कृष्ण कहते है । अतः एक आदमी जाकर रामप्रसाद जी को बुला लाया उन को देख कर आपने कहा राम तुम आ गए । थोड़ी देर में दौरा समाप्त हो गया । उस समय उन के घर वालों को राम का पता चला । उनके इन आचरणों से उनके सम्बन्धी कहते थे कि वे काफिर हो गये हैं । किन्तु वे इन बातों की कभी परवाह न करते और सदैव एकाग्र चित्त से अपने व्रत पर अटल रहते ।
जब काकोरी का मामला शुरु हुआ, उन पर भी वारण्ट निकला और उन्हें मालूम हुआ, तो वे पुलिस की आंख बचाकर भाग निकले । बहुत दिनों तक वे फरार रहे । कहते है उनसे कहा गया कि रूस या किसी और देश में चले जाओ । किन्तु वे हमेशा यह कहर टालते रहे कि सजा के डर से फरार नहीं हुआ हूं । मुझे काम करने का शौक है, इसीलिये मैं गिरफतार नहीं हुआ हूं । रूस में मेरा काम नहीं, मेरा काम यहीं है, और मैं यहीं रहूंगा-पर अंततः 8 सितम्बर 1926 को वे दिल्ली में पकड़ लिये गये । स्पेशल मजिस्टेट ने अपने फैसले में लिखाया कि वे उस समय अफगान दूत से मिलकर पासपोर्ट लेकर बाहर निकल जाने की कोशिश कर रहे थे । वे गिरफतार कर के लखनउ लाये गये और श्री शचीन्द्रनाथ बख़्शी के साथ उनका अलग से मामला चलाया गया ।
अदालत में पहुंचने पर पहिले ही दिन स्पेशल मजिस्टेट सैयद अर्हनुददीन से पूछा -आप ने मुझे कभी देखा है ? मैं तो आपको बहुत दिनों से देख रहा हूं । जब से काकोरी का मुकदमा आप की अदालत में चल रहा है तब से मैं कई बार यहां आकर देख गया । जब यह पूछा गया कि कहां बैठा करते थे तो उन्होंने बतलाया कि वे मामूली दर्शको के साथ एक राजपूत के भेष में बैठा करते थे । लखनउ में एक दिन पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट खां बहादुर साहब इनसे मिले !
मंगलवार, 14 दिसंबर 2010
गीत नहीं गाता हूँ....
गीत नहीं गाता हूँ
बेनक़ाब चेहरे हैं,
दाग़ बड़े गहरे हैं
टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ
लगी कुछ ऐसी नज़र
बिखरा शीशे सा शहर
अपनों के मेले में मीत नहीं पता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ
पीठ मे छुरी सा चांद
राहू गया रेखा फांद
मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूँ
गीत नहीं जाता हूँ
दूसरी अनुभूति:
गीत नया गाता हूँ
टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात
प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूँ
गीत नया गाता हूँ
टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलको पर ठिठकी
हार नहीं मानूँगा,
रार नई ठानूँगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूँ
सत्य का संघर्ष सत्ता से
न्याय लड़ता निरंकुशता से
अंधेरे ने दी चुनौती है
किरण अंतिम अस्त होती है
दीप निष्ठा का लिये निष्कंप
वज्र टूटे या उठे भूकंप
यह बराबर का नहीं है युद्ध
हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध
हर तरह के शस्त्र से है सज्ज
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज
किन्तु फिर भी जूझने का प्रण
अंगद ने बढ़ाया चरण
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
समर्पण की माँग अस्वीकार
दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते
साभार -श्री अटल बिहारी वाजपेयी
तब राष्ट्रपति ने हैरानी व्यक्त करते हुए कहा कि वो किसी भारतीय जन संघ नाम की पार्टी को नहीं जानते. अटल बिहारी वाजपेयी उन चार सांसदों में से एक थे.
वो इस घटना को याद करते हुए कहते हैं कि आज भारतीय जनता पार्टी के सबसे ज़्यादा सांसद हैं और शायद ही ऐसा कोई होगा जिसने बीजेपी का नाम न सुना हो.
शायद यह बात सच हो. लेकिन यह भी सच है कि भारतीय जन संघ से भारतीय जनता पार्टी और सांसद से देश के प्रधानमंत्री तक के सफ़र में अटल बिहारी वाजपेयी ने कई पड़ाव तय किए हैं.
नेहरु-गांधी परिवार के प्रधानमंत्रियों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी का नाम भारत के इतिहास में उन चुनिंदा नेताओँ में शामिल होगा जिन्होंने सिर्फ़ अपने नाम, व्यक्तित्व और करिश्मे के बूते पर सरकार बनाई.
पत्रकारिता
एक स्कूल टीचर के घर में पैदा हुए वाजपेयी के लिए शुरुआती सफ़र ज़रा भी आसान न था. 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर के एक निम्न मध्यमवर्ग परिवार में जन्मे वाजपेयी की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के ही विक्टोरिया ( अब लक्ष्मीबाई ) कॉलेज और कानपुर के डीएवी कॉलेज में हुई.
उन्होंने राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता में अपना करियर शुरु किया. उन्होंने राष्ट्र धर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन का संपादन किया.
जन संघ और बीजेपी
1968 से 1973 तक वो भारतीय जन संघ के अध्यक्ष रहे. विपक्षी पार्टियों के अपने दूसरे साथियों की तरह उन्हें भी आपातकाल के दौरान जेल भेजा गया.
1977 में जनता पार्टी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया. इस दौरान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया और वो इसे अपने जीवन का अब तक का सबसे सुखद क्षण बताते हैं. 1980 में वो बीजेपी के संस्थापक सदस्य रहे. 1980 से 1986 तक वो बीजेपी के अध्यक्ष रहे और इस दौरान वो बीजेपी संसदीय दल के नेता भी रहे.
सांसद से प्रधानमंत्री
अटल बिहारी वाजपेयी अब तक नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए हैं. दूसरी लोकसभा से तेरहवीं लोकसभा तक. बीच में कुछ लोकसभाओं से उनकी अनुपस्थिति रही. ख़ासतौर से 1984 में जब वो ग्वालियर में कांग्रेस के माधवराव सिंधिया के हाथों पराजित हो गए थे.
1962 से 1967 और 1986 में वो राज्यसभा के सदस्य भी रहे.
16 मई 1996 को वो पहली बार प्रधानमंत्री बने. लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा. इसके बाद 1998 तक वो लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे.
1998 के आमचुनावों में सहयोगी पार्टियों के साथ उन्होंने लोकसभा में अपने गठबंधन का बहुमत सिद्ध किया और इस तरह एक बार फिर प्रधानमंत्री बने. लेकिन एआईएडीएमके द्वारा गठबंधन से समर्थन वापस ले लेने के बाद उनकी सरकार गिर गई और एक बार फिर आम चुनाव हुए.
1999 में हुए चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साझा घोषणापत्र पर लड़े गए और इन चुनावों में वाजपेयी के नेतृत्व को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया. गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली.
शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010
भ्रस्टाचार पर बहस ...

भ्रस्टाचार का नाम आते ही अब जेहन में तूफान नही मचता क्यूँ ? क्यूंकि हम उसे जेहनी तौर पर स्वविकार चुके है दरअसल हर उस मुद्दे को भोथरा बना धार बिहीन करने की साजिश लम्बे समय से चल रही है वरन यह कहा जाये की साजिश के बीज बोये गये जो अब भ्रस्टाचार की लहलाहती फसल में बदल गये है इसी साजिश की दूसरी शक्ल है किसी भी मुद्दे का खाशियत का क़त्ल कर देना ताकि जब भी भ्रस्टाचार जैसा शब्द कान में पड़े तो सामने वाला तत्काल बोल पड़े की "अरे यह सब तो चलता ही रहता है" हल ही में फिर से देश परदेश में भ्रस्टाचार के कुछ नये पुराने मामलो पर बहस जारी है !
हाल ही में पूर्ब मुख्य सचिव नीरा यादव के जेल जाने और अनाज घोटाले पर अदालत की फटकार के बाद इस मुद्दे ने आम आदमी के दिलो दिमाग को एक बार फिर झकझोरदिया है !पर क्या नीरा से बाकि अफसर कुछ सीख लेंगे !क्या अनाज घोटाले में कोई जेल जायेगा !या ये सब टीबी और अखबारों की सुर्खिया बनकर ही रह जायेंगे !द्स्ताबेजो की माने तो अनाज घोटाला देश का सबसे बड़ा घोटाला बन गया है जो की लगभग ३५००० करोड़ का है !यह २००५ -२००४ में मुलायम सरकार में हुए थे जिसमे ८ सीडियो,सहित १७५ पर मुकदमा दर्ज़ है !इसी प्रकार मायावती के कार्यकाल में ताज कारीडोर मामला भी लगभग १७५ करोड़ का हुआ ,हालत ये हो गये की इसमें मायावती का नाम आने पर उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए २५ अगस्त २००३ को इस्तीफा तक दे दिया था !मुलायम सिंह के जमाने में हुआ पुलिसभर्ती घोटाला भी खूब चर्चा में रहा इसमें भी २५ आई पी एस ,११० पी पी एस ,शामिल बताये गये हालाकि बाद में हाई कोर्ट ने ३५००० पुलिस वालो को बहाल कर दिया था !
भ्रस्टाचार के इस मुद्दे पर पूर्ब पुलिस महा निदेशक एस एन शुक्ल का साफ कहना है की -जिस अफसर के मन में जरा भी निष्ठां हो उसे अपना काम बिना किसी दबाब के करना चाहिए ,इसमें कोई नुकसान नही होता पर गलत करने पर कभी न कभी तो जबाब देना ही पड़ता है ,हालत अखंड और नीरा जैसे भी हो सकते है !हवा कह रही है है की आने वाले समय में खासकर न्याय पालिका भ्रस्ताचारियो को बख्सने वाली नही है ,इसी पद से अवकाश ले चुके श्री राम अरुण का भी कुछ ऐसा ही कहना है की -गलत ढंग से पैसा कमाने और नेतावो के इशारे पर कंही भी मुहर लगाने वाले अफसरों को समझना होगा की उनका हाल भी इन्ही दोनों जैसा हो सकता है ,मेरा विचार है की अगर कुछ अफसर भी कमर कस लें तो भ्रस्टाचार को ख़त्म किया जा सकता है ,नेता कितने अफसरों को झुका लेंगे ,आई पी एस ,आई ऐ एस का ओ कर भी क्या सकते है बीएस नुकसान इतना होगा की मलाईदार पोस्ट नही मिलेगी पर फायदा बहुत होगा !
कुंवर समीर शाही
गुरुवार, 9 दिसंबर 2010
पत्रकारों को देख कर अयोध्या में बिफरी मुस्लिम महिला ..
बीते ६ दिसम्बर को अयोध्या में मेरे एक मित्र जो की हिंदुस्तान समाचार पात्र से जुड़े हुए है १९९२ के दंगे में दक्षिण पंथी अतिवादियो के शिकार हुए मुस्लिम परिवारों के वर्तमान हालत जानने के लिए उनसे मिलने गये थे वंहा उन्हें जिस हालत का सामना करना पड़ा वह काफी चौकाने वाला था वापस आने के बाद उन्होंने बताया था की किस तरह उनके वंहा जाने के बाद और उस बीते घटना चक्र का जिक्र करने के बाद टेढ़ी बाज़ार में रहने वाली महिला भड़क उठी थी की उन्हें किसी तरह भाग कर अपनी जान बचानी पड़ी थी हालत तो यह है की हिन्दू हो या मुसलमान अयोध्या में कोई भी अब इन सब बातो से अपना कोई वास्ता नही रखना चाहता सबको पता है की राजनैतिक पार्टिया उनसे जुड़े लोग बीएस अयोध्या के नाम पर अपनी दुकाने चलाना कहते है लेकिन अयोध्या का आम आदमी अब उनके लिए बिकने वाली चीज़ बने के लिए तैयार नही है विश्व हिन्दू परिषद् हो या बाबरी मस्जिद कमिटी सब का मूल बस अयोध्या के नाम पर राजनीत करना ही है
सच बताये तो मै तो पिछले १५ वर्षो से यही रहकर अनुभव कर रहा हूँ की अयोध्या का आम जनमानस कितना शांति प्रिये और भला है की पूरी दुनिया में हिन्दू मुसलमान के नाम पर कितना भी दंगा हो जाये पर अयोध्या के लोग अपनी पहचान हमेशा अलग ही बन्येया रखते है यही इस बार भी हुआ की ६ दिसमेर ऐसा गुजरा की किसी को पता भी नही चला न ही हर बार की तरह ६ दिसम्बर को अखबारों में पहले पन्ने पर जगह मिली सच में ये देखकर लग रहा है की हम परगति कर रहे है
समीर शाही
बनारस में तिरंगे को केक बनाया, काटा और खा गये कांग्रेसी

बनारस में आतंकी हमला ..
कहते हैं बनारस कभी सोता नहीं, बनारस आज भी नहीं सोयेगा शीतला घाट पर जिस जगह अब से कुछ घटने पहलों माँ गंगा की आरती उतारी जा रही थी वहां अब रक्त के लाल अंग के अलावा जूते चप्पल और टूटे हुयी कुर्सियां और पंडाल नजर आ रहे हैं , सीढियों पर राखी एक चौकी पर हारमोनियम और तबले सही सलामत रखे हैं घाटों के किनारे लगी नावों पर मल्लाह नदारद हैं ,पुलिस का सायरन के अलावा अगर कुछ सुनाई दे रहा है तो सिर्फ गंगा के निरंतर बहते जाने की आवाज, मानो कह रही हो हे बनारस तू चलता चल ,तुझे चलना होगा ,चलना तुम्हारा चरित्र है। शीतला घाट से महज कुछ सौ मीटर की दूरी पर मणिकर्णिका में जलती चिताओं के पास बैठा एक विदेशी अपने होठों से कुछ बुदबुदा रहा है, घाट से करीब ५० मीटर की दूरी पर राजू चाय की दूकान अभी खुली हुई है, हालाँकि ग्राहकों के नाम पर सिर्फ कुछ पुलिस वाले हैं जो आपस में बतिया रहे हैं कि अच्छा नाही भयल, देखा माहौल खराब नाही होए जाए।
कबीरचौरा अस्पताल में जब हम पहुंचते हैं तो वहां घायलों से ज्यादा भीड़ उन बनारसियों की नजर आ रही है जो अपने खून की बूँद बूँद घायलों को देने को बेताब है ,घायलों में शामिल तीन विदेशियों ने जिनमे से दो महिलायें हैं चुनरी पहन रखी है। भीड़ में शामिल असलम जिसके साथ में ठंडई पीने भर का नाता है न जाने किस अनजान बूढ़े के पास खड़ा डाक्टर को पानी चढाने में मदद कर रहा है। घर से फोन है ”चचा पूछते हैं कहाँ हो बताता हूँ अस्पताल तो कहते हैं आइबा ता पान लेले आइहा" शायद हर एक बनारसी जानता है कि ऐसे हमले इस शहर की किस्मत में हैं ,लेकिन इस शहर ने अब इन हमलों के मंसूबों के पीछे छुपे सच को जान लिया है सो एक वक्त दंगों का शहर कहे जाने वाले बनारस में ऐसे हमलों के बाद माहौल कभी खराब नहीं होता और मजबूत होकर उठ खड़ा होता है यह शहर। हाँ बनारसी अपनी भड़ास जरुर सरकार पर निकालते हैं ,एसएसपी बनारस प्रेम प्रकाश जब मारवाणी अस्पताल में पहुँचते हैं एक बनारसी भद्दी से गाली मगर धीमे स्वर में देते हुए कहता हां “हाँ ,छिनरो वाले ,तू लोग सुतल रहा “।
इसी अस्पताल में एक बच्ची की मौत हुई है ,पूरा अस्पाताल घर वालों के रुदन से गूंज रहा है ,लेकिन इस बार आंसुओं को पोछने के लिए हथेलियाँ बहुत ज्यादा नजर आती हैं ,मारवाणी असपताल के के नजदीक स्थित मदनपुरा इलाके में जो एक वक्त बनारस का सर्वाधिक संवेदनशील इलाका माना जाता था के मुसलमान निकल कर चौराहों पर आ गए हैं ,अपने प्रियजनों को खोजने वालों को रास्ता दिखाते हुए ,लुंगी पहने १२ साल का एक लड़का पुलिस की गाडी की आवाज सुनकर पने पीटा के पीछे दुबक सा गया है ,एक नवविवाहित जोड़ा अपनी मोटरसाइकिल पान की दूकान पर खड़ा करके ,ढेर सारे गहने पहने अपनी दुल्हन को सड़क की दूसरी पटरी पर छोड़कर पान बंधवा रहा है।
आज मंगलवार है हम संकटमोचन मंदिर पहुँचते हैं वहां पर पहले की अपेक्षा सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी नजर आ रही है ,मगर भीड़ कम नहीं हुई है ,हनुमान जी की आरती के बीच मेरी नजर कोने में बैठी एक खुबसूरत महिला पर पड़ती है जो न जाने क्यूँ रो रही है ,मंदिर के आँगन में आज कम से कम पांच शादियाँ हो रही है ,दूल्हा, दुल्हन और उनके रिश्तेदारों के चेहरों पर कोई शिकन नजर नहीं आ रही। रास्ते में मै अपनी मोटरसाइकिल अपने भाई को सौंप रिक्शे पर निकल लेता हूँ ,मध्य प्रदेश के सीधी जिले के रिक्शेवाले से जब मै पूछता हूँ तुम्हे पता है आज बम ब्लास्ट हो गया तो वो कहता है “हाँ सुनले रहली ,हमार सवारी छूट गईल पुलिस गौदालिया ओरी रिक्सा नाही जाए देत हौ “फोन की घंटी बजती है उधर से अभिषेक का फोन है ,कैंट स्टेशन पर आने को कह रहा है ,साथियों साथ चाय पीने का समय हो गया है ,एक घंटे बाद फिर अपने शहर को जागते देखूंगा
आजम खान तो आ गये पर करेंगे क्या?
आजम खान की वापसी को कुछ इस तरह लिया जा रहा है कि जैसे अब उत्तर प्रदेश का सारा मुसलमान सपा के साथ हो जाएगा। समाजवादी पार्टी के नेता यह न भूलें कि आजम खान मुसलमानों के ठेकेदार नहीं हैं। न ही मुसलमाना आजम खान सरीखे नेताओं के जरखरीद गुलाम हैं। आजम खान ने सत्ता में रहते हुए मुसलमानों पर ऐसा कुछ एहसान नहीं किया है, जिसको चुकाने के लिए मुसलमान मरे जा रहे हों। आजम खान तो सत्ता में रहते मलियाना कांड की जांच आयेाग की रिपोर्ट तक सार्वजनिक नहीं करा पाए थे। आजम खान ने मलियाना कांड को हमेशा ही अपनी राजनीति के लिए इस्तेमाल किया आज भी करते हैं। सच तो यह है कि आजम खान ने नहीं मुसलमानों ने समाजवादी पार्टी पर एहसान किया। उस एहसान के बदले में मुसलमानों को कुछ नहीं मिला। मुलायम सिंह यादव ने सत्ता की खातिर या यूं कहें कि अपने ’परिवार’ की खातिर इतनी कलाबाजियां खाईं हैं कि उनकी विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लग गया है। समाजवादी पार्टी एक तरह से मुलायम सिंह यादव के परिवार की पार्टी है। जब उनके परिवार के लगभग सभी सदस्य अपना ’कॅरियर’ राजनीति में ही बनाएंगे तो यही कहा जाएगा कि सपा मुलायम परिवार के लिए ’खाने-कमाने’ का जरिया मात्र है। हद तब हो गयी, जब फिरोजाबाद उपचुनाव में मुलायम ने अपनी बहु डिम्पल को उतार दिया। उनकी इस हरकत से जनता में संदेश गया था कि मुलायम सिंह यादव ’परिवार मोह’ मे पार्टी का बेड़ा गर्क करने पर तुल गए हैं। हम शुरू से ही कहते आएं हैं कि मुलायम सिंह यादव न तो कभी मुसलमानों के हितैषी थे और न कभी हो सकते हैं। बाबरी मस्जिद-राममंदिर विवाद की देन समाजवादी पार्टी भाजपा की कार्बन कॉपी है। उत्तर प्रदेश में सपा और भाजपा में यह गठजोड़ था कि भाजपा हिन्दुओं की राजनीति करेगी तो सपा मुसलमानों की। दिन में दोनों राजनैतिक मंच से एक-दूसरे को कोसते जरूर थे, लेकिन शाम को मुलायम और कल्याण सिंह अमीनाबाद में लस्सी साथ ही बैठकर पीते थे।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अक्टूबर 1990 में उन्होंने कानून का सहारा लेकर बाबरी मस्जिद को शहीद होने से बचा लिया था। मुसलमानों ने मुलायम के उस एहसान का बदला उन्हें भरपूर समर्थन देकर अदा किया था। लेकिन यह शर्मनाक रहा कि मुसलमानों को मुलायम सिंह यादव ने केवल एक वोट बैंक समझकर उनकी अनदेखी की। वोट के बदले आजम खान सरीखे एक दो मुसलमानों को मंत्री बनाकर यह समझ लिया कि मुसलमानों को सत्ता में भागीदारी मिल गयी है। सरकारी नौकरियों में केवल अपनी जाति के लोगों को तरजीह दी। मुलायम सिंह यादव की सरकार एक तरह से यादवों की सरकार रही। मुसलमान केवल वोट देकर सरकार बनवाने तक ही सीमित रहे।
मुलायम सिंह यादव ने मुसलमानों को समाजवादी पार्टी का ’अंध भक्त’ समझ कर बहुत बड़ी गलती की थी। इसलिए उन्होंने वे सब काम किए जो, मुसलमानों को पसन्द नहीं थे। सपा से उस साक्षी महाराज को राज्यसभा में भेजा, जिसने गर्व से कहा था कि बाबरी मस्जिद पर सबसे पहला फावड़ा उसने चलाया था। मुसलमानों ने इसे बर्दाश्त किया। फिर कल्याण सिंह के बेटे राजबीर सिंह को मंत्री बनाया। मुसलमानों ने इसे भी सहा। सच यह भी है कि मुलायम सिंह यादव ने कल्याण सिंह को लोध वोटों के लालच में अपने साथ लिया था। लेकिन लोध वोट तो मिला नहीं, मुस्लिम भी छिटक गए। मुसलमान इस बात को नहीं पचा पाए कि जिस कल्याण सिंह को मुसलमान अपना दुश्मन मानते रहे हैं, उस आदमी को कैसे समाजवादी पार्टी में बर्दाश्त किया जा सकता है। हालांकि मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह को सपा से बाहर करके और मुसलमानों से अपनी गलती की माफी मांग ली लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। मुसलमानों के सामने मुलायम सिंह यादव का चेहरा बेनकाब हो गया था।
अब आजम खान की बात करते हैं। कल्याण सिंह की वापसी पर ’नाराजगी’ जताने वाले आजम खान तब सपा में ही थे, जब साक्षी महाराज को राज्यसभा में भेजा गया था। आजम तब क्यों नाराज नहीं हुए थे। कल्याण सिंह का पुत्र राजबीर सिंह सपा सरकार में मंत्री बना, तब भी आजम सपा में ही थे। तब भी आजम क्यों चुप रहे। हकीकत यह है कि आजम खान को कल्याण सिंह को सपा में लिए जाने पर भी ऐतराज नहीं था। उनकी नाराजगी तो रामपुर से जया प्रदा को टिकट देने पर थी। आजम नहीं चाहते थे कि रामपुर सीट से जया प्रदा को टिकट दिया जाए। लेकिन तब मुलायम सिंह यादव इस भ्रम थे कि मुस्लिम वोटों की पूर्ति कल्याण सिंह की वजह से लोधों वोटों से पूरी हो जाएगी इसलिए आजम की नहीं सुनी गई। यकीन करिए रामपुर सीट मामले में मुलायम सिंह यादव आजम खान की मान लेते तो आजम को कल्याण सिंह भी कबूल थे। कल्याण सिंह को तो उन्होंने केवल ढाल बनाया था।
आजम खान की वापसी से सपा दोबारा में जान पड़ जाएगी यह केवल खामख्याली के अलावा कुछ नहीं है। बिहार ने संदेश दे दिया है कि जाति और धर्म की राजनीति करने वाले नेता अपने दिन गिनने शुरू कर दें। मंडल और कमंडल बीते जमाने की चीज हो चुकी हैं। आने वाले वक्त में विकास ही मुददा होगा। मुसलमान भी अब बाबरी मस्जिद का शोकगीत गाने के बजाय अपना और अपनी आने वाली नस्लों का उज्जवल भविष्य चाहते हैं। इस बात को आजम खान भी समझ लें और मुलायम सिंह भी, अब किसी के पार्टी में आने या जाने से मुसलमान अपना एजेंडा तय नहीं करेंगे। जो राजनैतिक दल आज तक भाजपा का डर दिखाकर मुसलमानों का वोट लेते आए हैं, वे सभी इस बात को भी समझ लें कि मुसलमानों के वोट चाहिए तो मुसलमानों को भी कुछ देना पड़ेगा।
साभार ..विस्फोट
विकीलीक्स के संस्थापक लंदन में गिरफ्तार
उनके वकील मार्क स्टीफेंस का कहना है कि ये आरोप आपसी सहमति के आधार पर लेकिन असुरक्षित यौन संबंध स्थापित करने से उभरे हैं. यह मामला अगस्त 2010 का है. स्टीफेंस का कहना है कि स्वीडिश जांचकर्ताओं ने इस मामले को राजनीतिक रंग दे दिया है.उधर, लंदन पुलिस ने बताया कि स्थानीय समय के अनुसार सुबह साढ़े नौ बजे एक पुलिस स्टेशन में असांज को गिरफ्तार किया गया. इससे पहले असांज ने पुलिस के सामने समर्पण किया. खुद असांज के वकील ने पुलिस से उनकी मुलाकात तय कराई. लंदन पुलिस ने एक बयान में कहा, "उन पर स्वीडन के अधिकारियों ने गैरकानूनी जबरदस्ती के मामले में एक आरोप, यौन छेड़छाड़ के मामले में दो आरोप और बलात्कार के मामले में एक आरोप लगाया है." मंगलवार को ही असांज को वेस्टमिन्स्टर के मजिस्ट्रेट के सामने पेश होना है.इससे पहले वकील ने बताया कि असांज स्कॉटलैंड यार्ड से बात करने को तैयार हैं. सोमवार को ब्रिटिश पुलिस को स्वीडन की तरफ से भेजा गया असांज का गिरफ्तारी वारंट मिला. अंतरराष्ट्रीय पुलिस एजेंसी इंटरपोल ने 30 नवंबर को असांज के नाम सर्वाधिक वांछित लोगों की सूची में शामिल किया. पिछले हफ्ते स्वीडन की सुप्रीम कोर्ट ने असांज को हिरासत में लिए जाने के आदेश को सही ठहराया.गोपनीय दस्तावेजों को उजागर कर दुनिया में तलहका मचाने वाली वेबसाइट विकीलीक्स पर हर तरफ से दबाव बढ़ता जा रहा है. स्विस अधिकारियों ने असांज के बैंक खाते को सील कर दिया है जिससे वह चंदा नहीं जुटा पाएंगे. यही नहीं, दुनिया भर की सरकारों के हैकरों की तरफ से हमलों के चलते विकीलीक्स को अपनी वेबसाइट ऑनलाइन बनाए रखने में बहुत परेशानियां आ रही हैं.विकीलीक्स की ओर से अब तक के सबसे सनसनीखेज खुलासों में एक रविवार को किया गया. 2009 के इस खुफिया अमेरिकी केबल में दुनिया भर की उन जगहों के बारे में जानकारी दी गई है जिन्हें अमेरिका अपनी सुरक्षा के लिए सबसे खतरनाक समझता है।
मै सोचता हूँ..

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010
जय हिंद
सोमवार, 6 दिसंबर 2010
रविवार, 5 दिसंबर 2010
उच्च न्ययालय पहुंचे प्रभु श्री राम
विकलांग बच्चों के लिए रिसोर्स सेंटर
गुप्तदान से संवर रहा जीवन

तुम्हारे बाद किसी की तरफ नहीं देखा..

शनिवार, 4 दिसंबर 2010
अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त
एक सुखांत प्रेमकथा
सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।उस पर लिखा हुआ वाक्य बुदबुदाते हुए लाल और सफेद रंग की उस डिबिया को मैंने फेंक दिया। वह शायद आगे बैठे किसी आदमी को जाकर लगी। उसने अँधेरे को लक्ष्य करके गाली दी। मैंने सिगरेट सुलगा ली।- तुम यहाँ भी शुरु हो गए। बुझाओ इसे।- भाईसाहब, यह सिगरेट बन्द कीजिए। आप नहीं जानते कि पब्लिक प्लेसेज़ में पीना गैरकानूनी है?पीछे से कोई अकड़कर बोला। मैंने बाएं हाथ से अँधेरे में ही उसकी गर्दन पकड़ ली। दाएं हाथ की दो उंगलियों के बीच वह जलती रही।- रिश, यह क्या नौटंकी है? छोड़ो इसे....उसने झटककर मेरा हाथ अलग करवाया। वह आदमी चुप हो गया था। मैं सामने के रंगीन पर्दे को देखता हुआ फिर पीने लगा। वह मुझे झेलती रही।कुछ मिनट बाद वह फिर बोली- कितनी बोरिंग फ़िल्म दिखाने लाए हो....और एक यह धुंआ बर्दाश्त करना पड़ रहा है। मैं और कुछ महीने तुम्हारी गर्लफ्रैंड रही तो अस्थमा हो जाएगा मुझे।मैं सिगरेट पर सिगरेट फूंकता रहा। वह हर दो-चार मिनट बाद इसी तरह बड़बड़ाती रही। आधा घंटा और बीत गया।- अब पूरे हॉल में मैं और तुम ही बचे हैं। सब चले गए तुम्हारी इस ‘नो स्मोकिंग’ से पककर...और अब मैं भी जा रही हूं।वह उठकर चल दी। मैंने उसका हाथ पकड़कर खींच लिया। वह मेरे ऊपर आ गिरी और मैंने अपने खुरदरे होठ उसके नकली गुलाबी होठों पर रख दिए।- तुम्हारे मुँह से बदबू आ रही है। सिगरेट पियोगे तो मुझसे नहीं होगा यह....वह कसमसाते हुए मेरी पकड़ से छूट कर चल दी।मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और सिगरेट का जलता हुआ सिरा उसकी हथेली से छुआकर उसकी मुट्ठी भींच दी। वह दर्द से बिलबिला उठी। फ़िल्म की आवाज़ की तरह ही उसकी चीख पूरे हॉल में गूंज गई।उसने किसी तरह हाथ छुड़ाया और दौड़ती हुई चली गई। स्क्रीन पर कोई छिपा हुआ चेहरा गाता रहा- घूंट घूंट जल रहा हूं...पी रहा हूं पत्तियाँ..मैंने अपनी हथेली में वही सिगरेट रखकर मुट्ठी बन्द कर ली। धुआं मेरी हथेली से होता हुआ आँखों तक पहुंचा और जलती हुई दो बूंदें गालों पर लुढ़क आईं।
---------------------------------------------------------------------------------------
मैं अकेला जब उस थियेटर से बाहर निकला, तब तक सूरज छिप चुका था। मैंने एक ऑटो वाले को रोका और फिर भूल गया कि मुझे कहाँ जाना है। उसने मुझसे दो-तीन बार पूछा। मैं उसकी ओर ऐसे देखता रहा, जैसे वह वहाँ था ही नहीं। वह कुछ बड़बड़ाता हुआ चला गया। मैं चुपचाप कुछ देर वहीं खड़ा रहा। फिर मेरे कदम एक दिशा में चल दिए।मैं जब शील के सामने बैठा था, उसके सिर के ऊपर लगी दीवार घड़ी में सात बजे थे। वह सब काम छोड़कर मेरा मौन सुनने के लिए बैठी रही। मैं ज्यादा देर तक उसके सामने नहीं बैठ पाया। कुछ देर बाद उसकी गोद में सिर रखकर लेट गया। सात बीस पर उसका मोबाइल बजा। मैंने उसके हाथ से फ़ोन लेकर काट दिया। वह चुप रही।- एक सिगरेट पी लूं शील?- नहीं...वह उस कमरे में हमारे बीच पहला संवाद था। वह मेरे बालों में उंगलियाँ तैराने लगी थी।- बाल कम हो रहे हैं तेरे। ज्यादा मत सोचा कर।उसके स्पर्श में स्नेह था।- कल रात मैं सोया उसके साथ....- किसके?स्नेह अब भी उतना ही था।- उसी के...मुझे नाम याद करने में कुछ क्षण लगे। उन दिनों मेरी याददाश्त तेजी से कम हो रही थी।- निहाँ के साथ।- तो?उसने ऐसे कहा जैसे कुछ न हुआ हो। मैं ऐसे बता रहा था जैसे काँच की प्लेट तोड़कर माँ के सामने अपराध स्वीकार कर रहा हूं। अब माँ ने डाँटा भी नहीं तो आश्चर्य तो होता ही!- तुम तो ऐसे बोल रही हो, जैसे सब कुछ पहले से ही पता हो तुम्हें।वह हँसी।- मैं लड़कियों के कपड़े देखकर तुझे बता सकती हूं कि कितने दिन में सोएगी तेरे साथ।मैं कुछ पल तक निहाँ का पहनावा याद करने की कोशिश करता रहा। मुझे कुछ याद नहीं आया। उसकी छवि दिमाग में बनती भी थी तो शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं होता था। मेरी याददाश्त सच में कमजोर हो रही थी।आखिरकार मैंने प्रयास छोड़ दिया।- मैं निहाँ से प्यार नहीं करता शील....चाहकर भी नहीं कर पाता। उसके चेहरे में रात भर वही दिखती रही मुझे...- तो क्या हुआ?- वह नाराज़ हो गई। बोली कि तुम्हारा मन नहीं करता। तुम मेरे साथ होते हुए भी साथ नहीं होते....- तो ज़ाहिर न होने दिया कर कि कुछ और सोच रहा है।अब वह मुझे नहीं सोचने की सलाह नहीं देती थी।- मैं नहीं कर पाता ऐसा। सब कहते हैं कि वह मेरी आँखों में बैठी हुई है। जब भी आँखें खोलता हूं तो वही दिखाई पड़ती है।शील ने अपने हाथों से पकड़कर मेरा चेहरा ऊपर को घुमाया और आँखें देखकर हल्का सा मुस्कुराई।- सच कहते हैं सब। तू आँखें बदलवा ले।- वह फिर मेरे माथे पर बैठ जाएगी.. कहीं और दिखने लगेगी।- तो छिपाना सीख उसे।- तुम तो कहती थी कि कोई और आएगी तो आसानी से भूल जाऊंगा उसे।- सब तो भूल जाते हैं इस तरीके से...कहकर उसने गहरी साँस ली।- मैं सोता हूं, तब हर सपने में भी वही दिखती है शील। मुस्कुराती हुई मेरे सिरहाने आकर बैठ जाती है, जैसे कभी गई ही न हो और मैं चौंककर जग जाता हूं और सुबह तक पड़ा पड़ा कुछ भी बड़बड़ाता रहता हूं....- रात को रूठ गई निहाँ?मेरे दिमाग में निहाँ की वही छवि फिर से घूम गई।- आज उसे पिक्चर दिखाने भी ले गया, लेकिन और नाराज़ कर दिया उसे। जाने क्यों....मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था आज।- मान जाएगी...मुझे लगा कि उसने फिर कपड़ों से अनुमान लगाया है।- मुझे नहीं मनाना। भाड़ में जाए निहाँ। मैं किसी और से प्यार कर ही नहीं सकता अब...- भूल जा उसे रिश।उसने न चाहते हुए भी वही पुरानी बात दोहराई। वह और कहती भी क्या?- नहीं भूल पाता शील। तुम क्या सोचती हो कि मैं कोशिश नहीं करता? दिन भर काम में लगा रहता हूं कि एक पल की भी फुर्सत नहीं मिलती। रात को इतनी पीता हूं कि पैसे भी नहीं बचते, सुध भी नहीं रहती। लेकिन वो कम्बख़्त हर काम में याद रहती है और बेहोशी में भी.....। शील, वह डायन बनकर मुझसे चिपक गई है...- प्यार भी करता है और डायन भी कहता है?वह अपनी कोमल हथेलियों से मेरा बेचैन दिमाग सहलाकर मुझे सुकून देने की कोशिश करती रही। मैं उसकी गोद में पड़ा पड़ा बच्चों की तरह पैर जमीन पर पटक रहा था। उसने मुझे तड़पने दिया, जैसे वह हमेशा मुझे मेरे मन का सब कुछ करने देती थी।फिर वह चाय बनाने चली गई। मैं सिगरेट फूंकने लगा। उसके कमरे की सफेद दीवारों पर धुआं जमने लगा। दीवारें फिर भी उजली ही रही।
---------------------------------------------------------------------------------------
मैं....मैं, जो उस शाम पीतमपुरा के उजले कमरे में शील के आँचल को पकड़कर रो रहा था, अगली सुबह बहुत खुश था। निहाँ पैर फैलाकर मेरे बिस्तर पर लेटी थी। मैं मंत्रमुग्ध सा होकर उसे देख रहा था। आले में भगवान शिव की एक मूर्ति रखी थी, जिसकी बगल में रखी माचिस अगरबत्ती जलाने के लिए लाई गई थी और अब मेरी सिगरेट के काम ही आती थी। उस मूर्ति को मैंने पर्दा खिसकाकर ढक दिया।निहाँ अपने नाम के बिल्कुल उलट थी। निहाँ का अर्थ है गुप्त, छिपा हुआ और मुझे नहीं लग रहा था कि कहीं कुछ छिपा हुआ था।मैं बहुत खुश था।- तुम वे पकाऊ फ़िल्में मत दिखाया करो रिश।उसने अपनी मादक आवाज़ में रुक-रुककर वाक्य पूरा किया।मैं उसे देखता रहा। सुबह से मैंने एक भी सिगरेट नहीं पी थी और न ही पीने का मन कर रहा था।- और आज परसों की तरह कहीं खो मत जाना....उसने हिदायतें पूरी की। मैं बिस्तर पर बिछ गया।हम दोनों इतने करीब थे कि एक-दूसरे की साँसें अपनी साँसें समझ कर पी रहे थे। मुझे केवल उसकी आँखें ही दिखाई दे रही थी। उसे शायद मेरी पुतलियों में बैठी किसी और की छवि दिखाई दी हो। उसने आँखें बन्द कर लीं।उस भरे-पूरे कमरे में, जिसमें मेरे कम से कम आठ जोड़ी कपड़े तह हुए लोहे की अलमारी में रखे थे, उसी कमरे में उसने मुझे पानी की तरह निर्वस्त्र कर दिया। मुझे लगा कि उसके शरीर पर तो कभी कोई आवरण था ही नहीं। वह जब भी याद आती थी, कपड़े कहाँ होते थे?- तुम कभी मुझ पर भी कविता लिखो रिश....वह उसी नशीले ढंग से बोली। मेरे दिमाग में जाने क्या आई कि मैंने उसकी सुराही जैसी सुन्दर गर्दन पर अपने दाँत गड़ा दिए। वह वैसे ही चीख उठी, जैसे पिछले दिन सिनेमा हॉल में चीखी थी। मैं उसे छोड़कर निढाल सा होकर एक तरफ पड़ गया।उसकी गर्दन पर माँस उखड़ आया था और खून निकलने लगा था। उसने एक झन्नाटेदार थप्पड़ मेरे गाल पर मारा और बाथरूम में चली गई। मैं हिला तक नहीं। मैं उस सामान से भरे हुए कमरे में नंगा होकर ऐसे लेटा रहा, जैसे सृष्टि का सारा नंगापन मुझे ही बयान करना हो।
---------------------------------------------------------------------------------------
शील मेरी मौसी की बेटी थी। वह चौदह साल की उम्र में अकेली घर से भाग गई थी। पूरे परिवार में मैं ही था, जिसे उसने बताया था कि वह कहाँ है। बाकी किसी को कभी उसके होने या न होने की खबर नहीं मिली। उसने दिल्ली में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की और नौकरी करने लगी। एक फ्लैट किराए पर लेकर अब अकेली उसमें रहती थी।उसने कभी नहीं बताया कि उसने घर क्यों छोड़ा। मेरी जानकारी में वह न किसी से प्रेम करती थी और न ही उसके मिलने-जुलने वालों में ज्यादा लोग थे। मैं ही था, जो वक़्त-बेवक़्त उसकी गोद में जाकर पड़ जाता था। कभी-कभी मैं सोचता था कि ऐसी ज़िन्दगी तो वह घर रहकर भी जी सकती थी। लेकिन शील सबसे अलग थी।दिल्ली की भीड़ में मेरे लिए तो वह सब कुछ ही थी- माँ भी और सहेली भी। मेरी उलझी हुई कविताएँ उसके कानों में पहुँचती थी तो जैसे सुलझ जाती थी। मेरी बहुत सी कविताओं के मायने उसने मुझे समझाए।उस शाम, जिसकी सुबह मैं बहुत खुश था, मैं शील को ज़िद करके अपने साथ निहाँ के घर ले गया। मैं जानता था कि मैंने बात को इतना बिगाड़ दिया है कि अकेला नहीं संभाल पाऊँगा। लेकिन उस शाम शील भी नहीं सँभाल पाई। मेरी एक और प्रेम-कहानी ख़त्म हो गई। मैं पीतमपुरा के उस साफ-सुथरे उजले कमरे में फिर रोता रहा, शराब पीता रहा और उसके कमरे में राख फैलाता रहा।हर महीने-दो महीने में यही सिलसिला दोहराया जाता था। लड़कियाँ बदल जाती थीं, लेकिन मैं हर बार मिताली को याद करके रात भर रोता रहता था। सब कहते थे कि वह मेरी आँखों में ही बैठी हुई है। एक दिन मैं बाज़ार जाकर सात-आठ काले चश्मे खरीद लाया था, जिससे किसी को मेरी आँखों में वह ना दिखाई दे। लेकिन अजित ने एक दिन कहा था कि उसने मेरे चश्मे में किसी लड़की की परछाई देखी। उस दोपहर मैंने सब काले चश्मे भी तोड़कर फेंक दिए थे।मैं वैसी हर रात शील के कमरे की दीवारों पर बुझी हुई सिगरेटों की कालिख से या उसके ड्रैसिंग टेबल की दराज में से काजल निकालकर ‘मिताली’ लिखता रहता था और अगली सुबह जब मैं उठता तो मेरी सिर उसकी गोद में ही होता था और वह सामने रखे लैपटॉप पर कुछ काम कर रही होती थी। सब दीवारें फिर वैसी ही सफेद होती थी और बहुत बार तो मुझे लगता था कि मैंने सपने में ही उन पर मिताली लिखा था।शील कभी उदास नहीं होती थी। कम से कम मेरे सामने तो कभी नहीं। और मैं था कि अक्सर उसे अपनी उदासी सुनाता रहता था। कई दफ़ा मेरी उदास कविताएँ वह रात भर सुनती रहती और अपना स्नेह भरा हाथ मेरे माथे पर रखे रहती। जब मैं बोलता था तो वह बहुत कम बोलती थी और जब मैं चुप रहता था तो कभी-कभी उसमें वही चौदह साल की लड़की की मासूमियत लौट आती थी। मैं दिन भर उसके फ्लैट में बैठा रहता और वह दौड़-दौड़कर उसका एक एक कोना साफ करती रहती, सजाती रहती। फिर शाम को आइसक्रीम खाने की ज़िद करने लगती और मेरे पैसों से आइसक्रीम खाकर ही मानती। गर्मियों की किसी दोपहर उस पर फ़िल्म देखने का भूत सवार हो जाता तो वह मेरे कमरे से जबरदस्ती खींचकर मुझे ‘प्रिया’ तक ले जाती।उसकी पसंद की हर चीज नियत थी। प्रिया में फ़िल्म देखती थी, इंडिया गेट पर पिकनिक मनाती थी, सरोजिनी नगर से शॉपिंग करती थी, बंगाली मार्केट में गोलगप्पे खाती थी, नई सड़क की मिश्राजी वाली दुकान से किताबें खरीदती थी, ज्ञानी की हट्टी की आइसक्रीम खाती थी और किसी इतवार की शाम अचानक मुझे बुलाकर ले जाती और अपनी बिल्डिंग की छत पर जोर-जोर से रोती थी। मैं उसे देखता रहता।एक दिन उसने कहा था - मैं तुम्हें इसलिए लाती हूं ताकि रोते-रोते कभी ऊपर से कूदने लगूं तो तुम मुझे थाम सको।लेकिन शील कभी उदास नहीं होती थी। पन्द्रह मिनट के उस मर्मभेदी विलाप के बाद सीढ़ियों से उतरते हुए वह किसी नई फ़िल्म की चर्चा कर रही होती थी या मेरी नई गर्लफ्रैंड के किस्से चटखारे लेकर सुन रही होती थी। छत पर बिखरे हुए उसके आँसू ठगे से हमें उतरते हुए देखते रहते।मैं भी मिताली से मिलने से पहले इतना उदास नहीं था।मिताली वह थी, जिसकी यादों से पीछा छुड़ाने के लिए मैं अपने कस्बे से सब कुछ छोड़-छाड़कर दिल्ली आ गया था। कई घंटे दिल्ली की सड़कों पर निरर्थक घूमने के बाद मैं शील के पास ही पहुँचा था। उसने मेरी आवाज़ सुनकर इतनी व्यग्रता से दरवाज़ा खोला जैसे वह वक़्त को रोककर मेरे पहुँचने से पहले ही मेरी प्रतीक्षा में दरवाजे पर खड़ी हो जाना चाहती हो।कई दिन तक मैं उसके फ्लैट पर ही रहा। वह भी छुट्टी लेकर घर पर बैठ गई थी और दिन भर मेरी उसी कहानी को बार-बार सुनती रहती थी। प्रेम के विफल होने के बहुत दिनों बाद तक व्यक्ति बहुत नीरस कहानियाँ सुनाता रहता है और भविष्य की निराशाजनक संभावनाएं तलाशकर उन्हें बार-बार दोहराता रहता है। उन किस्सों को दोहराने की मेरी आवृत्ति हालांकि समय के साथ कम होती रही, लेकिन शील ने भी कभी एक क्षण के लिए भी मुझे सुनने से मना नहीं किया।हाँ, मिताली ने शायद मुझ पर कोई टोटका कर रखा था। वह मेरी हल्की नीली आँखों में वैसे ही बैठी रही।---------------------------------------------------------------------------------------कभी वह साइकिल चलाती और मैं पीछे बैठता था और कभी मैं साइकिल चलाता था और वह मेरे साथ साथ दौड़ती थी।मैं साइकिल चला रहा था तो वह पंक्चर हो गई। मैं समझ नहीं पाया और उसे खींचने का यत्न करता रहा। पिछला टायर भी निरीह होकर घिसटता रहा। मेरी साँस फूलने लगी तो वह रुक गई और साइकिल का हैंडल पकड़कर मुझे भी रोक दिया। मैं गिरते-गिरते बचा।- पंक्चर हो गई है....अब मैं साइकिल से उतरा और खड़ा हो गया। वह साइकिल के आगे से घूमकर मेरी तरफ आई और मेरे हाथ से साइकिल ले ली।मैंने प्रस्ताव रखा - इसे यहीं छोड़ देते हैं।मेरी उम्र सात साल थी। वह मुझसे डेढ़-दो साल बड़ी रही होगी।- पागल हो गया क्या? मैं ले चलती हूं खींचकर।वह साइकिल लेकर आगे आगे चली। मैं उसका अनुसरण करता रहा। जेठ का महीना था। पाँच बजे होंगे, लेकिन गर्मी बहुत थी। उस धूल भरी पगडंडी पर थोड़ी दूर चलते ही हम दोनों पसीने में भीग गए। पास ही एक ट्यूबवैल दिखी।मैंने दूसरा प्रस्ताव रखा- यहाँ बैठ जाते हैं।इस बार वह मान गई। उसने धीरे से साइकिल को ज़मीन पर लिटा दिया और मुझे रास्ता दिखाती हुई ट्यूबवैल की ओर बढ़ी।एक छोटी सी डिग्गी बनी हुई थी। उसमें पानी लगातार गिरने से शोर भी बहुत हो रहा था और बहते हुए पानी की गति भी बहुत थी। हम दोनों डिग्गी की मुंडेर पर आमने सामने बैठ गए और हमने उस बहते पानी में पैर लटका लिए। हम जामुन की छाँव में थे। बार बार हरे, काले और लाल जामुन हमारे बीच के पानी में गिरते थे और पानी के तेज प्रवाह के साथ ईख के खेतों में चले जाते थे। मेरी आँखें मछली बनकर उनके साथ-साथ कुछ दूर तक तैरती थी और फिर वापस डिग्गी में लौटकर नया साथी ढूंढ़ लेती थी।- तुझे खाने हैं जामुन?उसने अचानक पूछ लिया। मैं कुछ बोला नहीं, लेकिन मेरी आँखें चमक उठीं। वह मछलियों की बोली जानती थी। पल भर में उठी और उस पेड़ पर चढ़ गई। वह चुन-चुनकर जामुन तोड़कर फेंकती रही और मैं खाता रहा। मैं छक गया तो वह उतर आई।- तू नहीं खाएगी?- नहीं, मेरा पेट भर गया।- तूने तो खाए ही नहीं...- नहीं, अब भूख नहीं है।वह हँस दी और फिर मेरे सामने पानी में पैर लटकाकर बैठ गई।- तेरा चिड़िया बनने का मन नहीं करता?- करता है...- मेरा भी करता है पर डर लगता है कि चिड़िया बनकर दूर उड़ गई तो वापस कैसे आऊंगी?- मैं ले आऊंगा तुझे।मैंने कल्पना में पंख, घोंसला और आकाश बुन लिए थे।- चल, चलते हैं।वह मुझे धरती पर ले आई।- रिश, तुझे पता है....किसी को कोई अच्छा लगने लगता है तो वह उसके साथ घर से भागकर कहीं दूर चला जाता है....चिड़िया की तरह...वह उठकर चल दी थी। मैं आधी बात समझ पाया था और आधी नहीं। हैरान सा मैं भी गीले पैरों को धूल से बचाने का असफल प्रयास करते हुए उसके पीछे-पीछे चल दिया।- अच्छे कैसे लगते हैं?मैंने पूछ ही लिया। इस पर वह मुड़कर रहस्यमयी तरीके से मुस्कुराई। वह उसी मुस्कान पर रुकना चाहती थी, लेकिन कच्ची उम्र के कारण थम नहीं पाई और हँसी फूट पड़ी।- जैसे तेरी मम्मी को तेरे पापा अच्छे लगते हैं।- पापा को मम्मी अच्छी नहीं लगती?- लगती है बाबा....वह फिर झूलती हुई सी चल दी।- और मेरी मम्मी को तेरे पापा?मैंने अगला प्रश्न पूछ लिया।- छि, ऐसा नहीं कहते।उसने पलटकर मुझे आँखें दिखाई। मैं कुछ क्षण चुप रहा। उस दौरान उसने लेटी हुई साइकिल को उठाकर खड़ा किया और हम साइकिल के साथ उसी धूल भरी पगडंडी पर फिर चलने लगे।- तो फिर मम्मी पापा दूर क्यों नहीं गए?- पता नहीं....- क्या पता....हम दूर में ही रहते हों।- हाँ, यह हो सकता है।- तुझे दीदी कहा करूं?- क्यों?- मम्मी कहती है। डाँटती है।- नहीं, कोई जरूरत नहीं है। शील ही कहा कर।- ठीक है।- तू भी मुझे बहुत अच्छा लगता है रिश।मुझे लगा कि जामुनों के भीतर से लाली निकलकर मेरे गालों पर आ गई थी। मैं कुछ नहीं बोला।- जो हम चिड़िया होते तो दूर से भी दूर चले जाते – वह बोलती रही – चलता तब तू?मैंने हाँ में गर्दन हिला दी और हँसने लगा। वह भी हँसने लगी। सब हँसने लगे।कुछ साल बाद चिड़िया अकेली उड़ गई। मैं गर्मी की वह शाम भूल गया।
---------------------------------------------------------------------------------------
- अच्छा है कि तुमने कभी प्यार नहीं किया शील।मैं उसकी बिल्डिंग की छत पर लेटकर सिगरेट फूंक रहा था। वह इधर-उधर घूम रही थी। वह कुछ नहीं बोली, घूमती रही।- मुझे रोज लगता है कि मैं मिताली के बिना मर जाऊंगा और मरता भी नहीं....। वो हर पल मेरे साथ रहती है, मारती रहती है।वह घूमती रही। तेज हवा से उसके बाल बार-बार उड़कर चेहरे पर आ जाते थे और वह दूसरी दिशा में मुड़ती थी, तो अपने आप ही हट जाते थे।- प्यार में कुछ लोग तेरी तरह मुखर हो जाते हैं रिश....और कुछ मौन।उस दिन इतवार था। वह मुझे अपनी बिल्डिंग की छत पर ले आई थी, लेकिन अब तक रोई नहीं थी। आकाश में कुछ घटाएँ छाई हुई थी। समय से पहले ही अँधेरा होने लगा था।- मैं साला आज भी नहीं समझ पाता कि मिताली गई क्यों....मैंने आधी सिगरेट जोर से जमीन पर मसल कर बुझा दी और बेचैन होकर बैठ गया।- मिताली, मिताली, मिताली.........पागल हो जाऊंगी मैं सुन-सुनकर....वह चिल्लाई। वह ऐसे चिल्लाई, जैसे किसी ने कुछ न कहा हो। उसके चिल्लाते ही इस तरह सन्नाटा हो गया, जैसे वह पहले से वहीं था। मैं उसकी इस प्रतिक्रिया पर कुछ देर भौचक्का सा होकर उसे देखता रहा। वह टहलती हुई रुक गई थी और अब उसकी आँखें चिल्ला रही थी। मेरी आँखें इतना शोर नहीं सुन पाईं। मैं आँखें बन्द करके लेट गया।देर हो रही थी, लेकिन अँधेरा कम होने लगा था। घटाएँ छँटने लगी थी। पक्षियों के जो झुण्ड अपने घर लौट रहे थे, उस छत पर बैठकर शोर और खामोशी सुनने लगे थे। लेकिन वह ज्यादा देर तक वैसी नहीं रही।वह मेरे पास आकर बैठ गई और मेरा सिर उठाकर अपनी गोद में रख लिया। मैंने आँखें खोलीं तो पक्षी जा चुके थे, अँधेरा फिर बढ़ने लगा था और बादल फिर छाने लगे थे।- सॉरी रिश, न जाने क्या बोल दिया मैंने।शील मुस्कुराकर पहले वाली शील ही बन गई थी। मैं चुप रहा। उसे पहचानने का यत्न करता रहा, खोजता रहा कि कौनसी शील सच्ची थी।वह इतवार की शाम थी, लेकिन वह रोई नहीं। उसके आँसुओं को सोमवार के आने का इंतज़ार करना पड़ा।
---------------------------------------------------------------------------------------
वह रात ऐसी थी, जैसी दूसरी कोई नहीं बनी थी। उस रात सड़क पर कुत्ते नहीं भौंक रहे थे। उस रात कभी अँधेरा हो जाता था और कभी उजाला। सूरजमुखी के फूल भी खिले थे और रात की रानी भी। असल में दिल्ली के बीचों बीच एक सफेद रेखा खिंची हुई थी, जिस पर कई मील चौड़ा और कई मील ऊँचा दर्पण रखा था। दर्पण के उत्तर में हम थे और दक्षिण में प्रतिबिम्ब या यह होगा कि दक्षिण में वास्तविकता होगी और उत्तर में हम प्रतिबिम्ब!उधर दिन था, इधर रात थी और दोनों मिले-जुले लग रहे थे। इधर का कोयला उधर हीरा दिखाई दे रहा था और उधर का सोना इधर काली मिट्टी बनकर चमक रहा था। इधर कोई रोता था तो उधर ठहाके सुनाई पड़ते थे और बीच-बीच में सब कुछ एक ही हो जाता था। उस रात दिल्ली में काले-सफेद, सुन्दर-असुन्दर, अच्छे-बुरे, नैतिक-अनैतिक को पहचानना असंभव था और कोई इन कसौटियों से किसी निष्कर्ष पर पहुँचता तो यकीनन गलत होता।जिन्होंने इतिहास पढ़ा है, वे जानते होंगे कि भारत की पहली ट्रेन मुम्बई से थाणे के बीच नहीं चली थी।दुनिया की पहली रेलगाड़ी उत्तरप्रदेश के एक छोटे से कस्बे बुढ़ाना और दिल्ली के बीच चली थी। उसका ज़िक्र किताबों में नहीं किया गया, इसके पीछे वही उत्तरदायी रहे होंगे, जिन्होंने उस रात भी दिल्ली में काले और सफेद को अलग-अलग करने की चेष्टा की थी।उस रेलगाड़ी में ड्राइवर नहीं था। बुढ़ाना से एक चौदह साल की लड़की सदियों पहले उसमें दिल्ली आने के लिए चढ़ी थी और उसके दिल्ली में उतरते ही रेलगाड़ी भी गायब हो गई और उसका ज़िक्र भी। उसे इतनी प्यास लगी थी कि वह यमुना को पूरा पी गई, लेकिन उसकी प्यास नहीं बुझी। दिल्ली में त्राहि-त्राहि मच गई। राजा ने उसे ढूंढ़कर लाने का आदेश दिया। वह अकेली लड़की सदियों तक दिल्ली की तंग-परेशान-हैरान गलियों में भटकती रही और आखिरकार एक ऊँची इमारत की तीसरी मंजिल पर एक फ्लैट में आकर छिप गई। वह साँस भी नहीं लेती थी कि कोई कहीं सुन न ले। वह आह भी नहीं भरती थी कि कहीं किसी को उसकी तकलीफ़ देखकर शक न हो जाए। वह हँसती रहती थी क्योंकि दिल्ली में रोना अपराध था।और उस दर्पण वाली रात, जब उधर एक लड़की सर्दी से ठिठुर रही थी तो शील गर्मी से बावली होने लगी। उधर की लड़की जब प्यार के ढेरों कम्बल ओढ़ रही थी, शील ने सब आवरण उतार फेंके। मैं उसके उसी कमरे में सो रहा था, जब वह मेरे ऊपर आ गिरी। शीशे में जो प्रतिबिम्ब दिख रहा था, उसमें लड़की ऊपर आकाश की ओर उठती जा रही थी। वह मुझे बेतहाशा चूम रही थी। शीशे वाली लड़की के होठों से फूल झड़ रहे थे।मुझे नहीं मालूम कि मैं कितनी देर बाद जगा और शीशे वाली लड़की तब तक कितना ऊपर उठ चुकी थी, लेकिन इतना याद है कि आँख खुलते ही मैं चौंक गया और मैंने शील को धकेलकर ज़मीन पर फेंक दिया।वह बहुत मासूम थी, भोली थी, निर्मल थी – शीशे के उधर भी और इधर भी।अपने सच की दुनिया में मैंने उसे झटककर दूर फेंक दिया था और वह नीचे गिरी पड़ी थी। लेकिन मुझे याद है कि शीशे के उस पार शील देवी बन गई थी और उसकी पूजा की जा रही थी। पता नहीं, वह वर्तमान था, अतीत था अथवा भविष्य....कुछ था भी या नहीं....लेकिन वह दर्पण अगले ही क्षण टूट गया और श्रीकृष्ण की सूखी यमुना में जा गिरा।शील अगले चौबीस घंटों में इतना रोई कि यमुना फिर से भर गई। जिन्होंने उस रात नैतिक और अनैतिक में भेद किया, उन सब को मरने के बाद कठोरतम नर्क मिला।जिन्होंने इतिहास पढ़ा है, वे इन बातों को बेहतर जानते होंगे। मैंने कभी इतिहास नहीं पढ़ा।मैं रात के एक बजे आधे कपड़ों में उसके फ्लैट से निकल आया। वह पड़ी रही।---------------------------------------------------------------------------------------और जैसे बीता हुआ समय लौट आता है, कमान से निकला हुआ तीर लौट आता है, जुबान से निकले हुए शब्द लौट आते हैं। वैसे ही एक दिन मिताली लौट आई।उस दिन, जिस दिन मुझे पहली बार लगने लगा था कि वह अब कभी नहीं आएगी, वह लौट आई। इतने बड़े शहर में जैसे तैसे तलाश करके वह मेरे कमरे पर पहुँची थी।दो साल में ही वह इतनी कमजोर हो गई थी, जितना कोई पूरी कोशिश करके भी कम से कम दस साल में हो पाता। उसके चेहरे पर स्थाई मायूसी सी छाई हुई थी, जो उसके स्वाभाविक गुलाबी रंग पर हावी हो गई थी। उसे देखकर मेरे मन में असीमित प्यार उमड़ना चाहिए था, लेकिन पहला भाव दया का आया।वह, जो बिना कारण बताए मुझे छोड़ गई थी, मेरे दरवाजे पर खड़ी थी। मैंने न जाने का कारण पूछा था और न ही उस दिन लौट आने का कारण पूछा। वह इस तरह मेरे घर में आ गई, जैसे उसे मालूम हो कि इस पर सिर्फ़ उसका ही अधिकार है।सिगरेट पीने से मेरे होठ काले पड़ने लगे थे, जिन्हें उसने कुछ क्षण के लिए गुलाबी कर दिया। मैं न रोया, न हँसा। कुल मिलाकर मैं उस समय को सहन नहीं कर पा रहा था। मैं उसे अपने कमरे में छोड़कर बाहर निकल गया और शाम तक इधर-उधर आवारा सा भटकता रहा। पिछले चार दिन से मैं शील के घर वाली घटना को सोचता हुआ अपने कमरे में ही पड़ा रहा था। शील रोज सुबह फ़ोन करती थी, लेकिन मैं काट देता था। मुझे लग रहा था कि मैं इतने तनाव के बीच पागल हो जाऊंगा, लेकिन पागल भी नहीं हो पाया था।फिर भी मैं रात को कमरे पर लौटा तो बहुत खुश था। मिताली मेरा इंतज़ार कर रही थी। मैं बहुत पीकर आया था और मुझे लग रहा था कि मैंने दुनिया की सब खुशियाँ पा ली हैं। दोपहर का सारा पागलपन और बेचैनी कहीं उड़ गए थे।मैंने मौसी को फ़ोन कर दिया कि उनकी शील, जो वर्षों पहले खो गई थी, दिल्ली में है। वह लड़की, जो केवल मुझे बताकर दस साल पहले घर से भागी थी, मैंने उसके माँ बाप को उसका पता बता दिया।मैं बहुत खुश था। वे भी बहुत खुश थे। मिताली भी खुश थी।---------------------------------------------------------------------------------------- मैं तुमसे प्यार करती हूं रिश।एक प्लास्टिक की टूटी हुई सी गुड़िया, जिसके गाल पहले कभी गुलाबी हुआ करते थे, मेरे सामने बैठी थी।- मैं भी तुमसे प्यार करता हूं।मैंने जो वर्षों पहले कहा था और वर्षों तक कहता रहा था, वह अपने में ‘भी’ जोड़कर कमरे में गूँज रहा था।- हम शादी कर लेते हैं...प्लास्टिक की गुड़िया मुस्कुराई।- वो तो सब कर लेते हैं।- हम इतना प्यार करेंगे कि सब पुरानी बातें भूल जाएँगे।- सब भूल जाते हैं।- मैं जानती थी कि तुम मेरा इंतज़ार करते रहोगे रिश....- तुम बहुत कुछ जानती हो......। भगवान हो?वह हँस कर आगे को झुकी। मैं उठकर खड़ा हो गया।- तुम्हारा यही पागलपन तुम्हारी खासियत है रिश।मैं हँसने लगा। इतना हँसा कि वह घबरा गई। फिर मैं खामोश हो गया। वह उसी तरह की बातें बोलती रही। मैं अपने कमरे में वे काले चश्मे ढूंढ़ता रहा। मुझे लग रहा था कि मेरी आँखों पर मेरा नियंत्रण नहीं है। लेकिन चश्मे तो तोड़ दिए गए थे, वे नहीं मिले।- बरसों से तुम्हारी कविताएँ नहीं सुनीं। आज रात भर सुनना चाहती हूं....मैं उसे घंटों तक औरों की कविताएं सुनाता रहा। अपनी एक भी कविता सुनाने का मन नहीं किया। मुझे लगा कि वे उसके कानों में पड़ी तो मैली हो जाएँगी। कविता सुनते सुनते वह भावुक हो गई। मैं नहीं हुआ। फिर उसने मुझे चुप करवा दिया।हम दोनों बिस्तर पर बिछ गए।कुछ मिनट बाद वह मेरी आँखों में देखकर डर से चीख उठी और मुझे उसी तरह अपने ऊपर से धकेल दिया, जिस तरह मैंने शील को गिराया था। वह काँप रही थी।- तुम्हारी आँखों में कोई लड़की है....मैं गिरता-पड़ता उठा और सामने दीवार पर लगे शीशे के सामने जाकर खड़ा हो गया। मेरी मौसेरी बहन मेरी आँखों में थी। मैं खुद को बर्दाश्त नहीं कर पाया और कमरे से निकलकर भाग लिया।नहीं, यह गलत है....मैं भागता रहा....सुनसान सड़कों पर........कुछ पहचाने, कुछ अनजाने रास्तों पर.....मैं अपने आप को दुनिया की सबसे गन्दी गालियाँ देता हुआ, चिल्लाता हुआ भागता रहा।मेरे पीछे भी कोई नहीं भाग रहा था और मेरे आगे भी मुझ जैसा कोई नहीं था। मैं रात भर दौड़ता रहा। उन काले रास्तों पर मैं अकेला था।---------------------------------------------------------------------------------------एक सुखांत!अगली सुबह ऋषभ नाम का एक लड़का, जो रात भर दिल्ली की सड़कों पर दौड़ता रहा था, शील नामक एक लड़की के घर पहुँचा।- तुम्हारे मम्मी-पापा पहुँचते ही होंगे।वह सब समझ गई, जैसे पहले से ही जानती हो।- मैं तुमसे प्यार करता हूँ....इस बार दो लोग भागे। वे दोनों गहरी खाई में जा गिरे थे।दर्पण में दिखाई दिया कि दो सुनहरे खूबसूरत पंछी उन्मुक्त होकर आसमान में उड़ रहे हैं।उन दोनों ने दर्पण को सच समझा और बाकी सब ने खाई को.....
गुरुवार, 2 दिसंबर 2010
बिहार में बुझ गयी लालटेन

लालू और पासवान को भी अब इस बात का अंदाज़ा अच्छी तरह से हो गया होगा कि बिहार के लोग बिहारी तो हैं, मगर दिल्ली वाले 'बिहारी' नहीं हैं। इस बार जनता ने इन दो नेताओं का जो हाल किया है उसे वो काफी दिनों तक भूल नहीं पाएंगे। आखिर इन दोनों को यह बात समझ में क्यों नहीं आती की जनता को विकास चाहिए, उसे किसी के बेटे या बीवी से क्या मतलब? लालू और पासवान दोनों ने अपने अपने बेटे को इलेक्शन में घुमाया। मगर जनता ने उन्हें उनकी औकात बता दी और बता दिया कि न तो लालू का बेटा अजहरुद्दीन है और न ही पासवान का बेटा संजय दत्त। एक ने कोई ऐसा मैच ही नहीं खेला कि उसे याद रखा जाये, दूसरे ने कभी कोई फिल्म भी बनाई है इसका किसी पता ही नहीं। रहा सवाल पत्नी का तो राबड़ी देवी में ऐसी कौन सी खूबी है कि जनता उसे वोट दे। जनता को तो यह पता था कि पति ने तो हमें लूटा ही इस महिला ने भी खूब लूटा तो फिर दोबारा अवसर क्यों दिया जाये। यही कारण है की राबड़ी दो स्थानों से इलेक्शन लड़ी और दोनों जगह से हार गयीं। पासवान के भाई का भी बुरा हाल हुआ।
लालू और पासवान जी को जनता ने अपना जनादेश सुना कर यह बताने की कोशिश की है कि अब बिहार के लोगों में भी समझ आ गयी है। उन्हें भी लगने लगा है कि जात-पात और धर्म की राजनीति बकवास की चीज़ है। सब से ज़रूरी चीज़ है विकास। विकास के बिना सब कुछ बेकार है। क्या बिहारी नहीं चाहते की उनके घर में भी बिजली आए, क्या बिहारी नहीं चाहते की बिहार की सड़कें भी देश के दूसरे राज्यों की सड़कों जैसी हों, क्या बिहारी यह नहीं चाहते की जब वो शाम को दिन भर काम करके अपने घर लौटें तो उन्हें कोई लूटे नहीं, क्या बिहार के ठेकेदार यह नहीं चाहते उनसे कोई रंगदारी टैक्स नहीं ले, क्या स्कूल के विद्यार्थी यह नहीं चाहते कि उनका टीचर पाबंदी से स्कूल आए, क्या कॉलेज के विद्यार्थी यह नहीं चाहते की देश के दूसरे कॉलेज और यूनिवर्सिटी की भांति उनका सेशन लेट न हो। बिहार में भी ऐसा ही चाहने वाले लोग हैं और उन्हें ऐसा माहौल दिया जा रहा है या फिर ऐसा माहौल देने की हर संभव कोशिश की जा रही है, तो फिर नितीश एंड कंपनी की मदद क्यों नहीं की जाये। उन्हें वोट क्यों नहीं दिया जाये। इलेक्शन से पहले ऐसा कहने वालों की कमी नहीं थी कि बिहार में जात-पात के आधार पर इलेक्शन होता है, इसलिए नितीश ने लाख काम किए हों मगर लालू और पासवान को भी बहुत सीटें मिलेंगी। मगर इलेक्शन के नतीजे ने बता दिया कि दूसरे राज्यों की भांति बिहार के लोगों को भी विकास पसंद है और वो भी उसे वोट देंगे जो उनके विकास की बात करेगा। सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि अब तो सारा देश देख रहा है कि नितीश के आने के बाद बिहार में काफी काम हुये हैं।
ऐसा भी नहीं है की बिहार को नितीश कुमार ने जन्नत बना दिया है। अभी बहुत से काम ऐसे है जो उन्हें करने की ज़रूरत है। बहुत से काम ऐसे हैं जो उनके अफसर उन्हें बताते हैं कि हो गया मगर सही मायने में वो होता नहीं है। उन्हें काग़ज़ पर तो होता हुआ नज़र आता है मगर सच्चाई में ऐसा नहीं होता। बिहार में योजनाओं की कमी नहीं है, मगर इसका लाभ उचित तरीके से उन लोगों को नहीं मिल रहा जिन के लिए यह योजनाएँ बनी हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि फलां जगह इतने लोगों के नाम बीपीएल में दर्ज हैं, जबकि इतने लोगों को इंरिदा आवास योजना के तहत घर दिये गए। मगर सच्चाई यह है की बीपीएल में ऐसे लोगों के नाम भी दर्ज हैं जो महीने में हजारों कमाते हैं। इंदिरा आवास के तहत जिन लोगों को घर के लिए पैसे मिलते हैं उन्हें भी पूरी रकम नहीं मिलती। शिक्षा में सुधार तो हुआ है मगर इसे बहुत बेहतर नहीं कहा जा सकता। अब भी कई स्कूल ऐसे हैं जहां बहुत सारे बच्चों को पढ़ाने के लिए एक ही टीचर है। बहुत सारे स्कूल ऐसे हैं जहां पीने का पानी नहीं है। बहुत सारे स्कूल ऐसे हैं जहां शौचालय भी नहीं है। अभी भी लाखों की संख्या में ऐसे बच्चे है जिन्हें स्कूल में होना चाहिए, मगर वो कहीं काम कर रहे होते हैं। यही नहीं यदि अचानक स्कूल मुआयना किया जाये तो बहुत से स्कूल में टीचर ग़ायब रहते है।
अफसोस की बात यह है कि सर्व सिक्षा अभियान के तहत जो किताबें मुफ्त बांटे जाने के लिए होती हैं उन्हें कहीं कहीं खरीद कर हासिल किया जाता है। बहुत से स्कूल ऐसे हैं जिनमें शिक्षकों की कमी है। जो हैं भी वो पढ़ाने में रूचि नहीं लेते। स्कूल में बच्चों को खिलाने के लिए जो अनाज आता है उसे कोई और लेकर चला जाता है। स्कूल के टीचर और मुखिया मिलकर इसे बाज़ार में बेच देते हैं। आवासीय प्रमाण-पत्र या फिर जन्म या मृत्यु प्रमाण-पत्र बनवाना हो बिना पैसे के बिना यह चीज़ें नहीं बनती। स्कूल में मुफ़्त खाने की बात कही जाती है, मगर कई स्कूल ऐसे हैं जहां हफ्तों हफ्तों खाना नहीं बनता। शिक्षा मित्र के तौर पर जो टीचर बच्चों को पढ़ा रहें हैं उनमें कई ऐसे है जिन्हें अभी खुद पढ़ने की ज़रूरत है। शिक्षा मित्रों को अपनी सेलरी के लिए मुखिया की, चाहे वो अनपढ़ ही क्यों न हो, मालिश करनी पड़ती है। ऐसे टीचरों को रिश्वत देने के बाद ही सेलरी मिलती है। टीचर आगे किसी से इसकी शिकायत भी नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें पता है कि वो भी बेईमानी से ही टीचर बने हैं। कुल मिलाकर नितीश जी के बहुत काम करने के बाद भी अभी बहुत कुछ करने की ज़रूरत हैं। नीचे से लेकर ऊपर तक रिश्वत लेने-देने का सिलसिला जारी है। इस पूरी बेइमानी में छोटे मोटे दलाल, मुखिया, ग्राम सेवक, बीडीओ और दूसरे सभी अफसर शामिल हैं। जो अफसर लालू प्रसाद के जमाने में बेईमान थे वो अब भी बेईमान हैं। बिहार में जब कई साल बाद मुखिया इलेक्शन हुआ तो लूले-लँगड़े सब मुखिया बन गए। इससे लोगों का तो भला नहीं हुआ मुख्य लोग ग़रीब से अमीर बन गए। अब जबकि नितीश को जनता ने एक और अवसर दिया है तो उन्हें चाहिए कि इन सब खामियों पर क़ाबू पा कर वो जनता की आशाओं पर खड़े उतरें ताकि वो भी एक मिसाली मुख्यमंत्री बन सकें।