भारतीय संस्कृति में प्राचीनकाल से ही विभिन्न विचारधाराएं एक दूसरे पर असर डालती रही हैं। भिक्षु संघ, संघराम, विहार आदि के जरिये बौद्ध धर्म की समाज में महत्ता सिद्ध होती थी। शंकराचार्य ने इसी का अनुकरण कर प्राचीन आश्रम और मठ परम्परा में नए प्राण फूंके। शंकराचार्य ने अपना ध्यान संन्यास आश्रम पर केंद्रित किया और समूचे देश में दशनामी संन्यास परम्परा और अखाड़ों की नींव डाली।
उत्सवों और पर्वों के लिए प्रसिद्ध भारतीय संस्कृति में चार माह तक चलनेवाला, कुम्भ पर्व सदियों से ‘भक्ति और आस्था’ का परम प्रतीक बना हुआ है। देश के चार प्रमुख तीर्थों पर बारह वर्ष के अंतराल पर यह विराट आयोजन होता है। प्राचीनकाल में देश के करोड़ों धर्मप्राण लोगों को इस तरह प्रत्येक तीसरे वर्ष भक्ति, दर्शन की परम्परा से जुड़ने और खुद में ज्ञान चेतना जगाने का अवसर मिलता था। कुम्भ के अवसरों पर प्रति तीसरे वर्ष करोड़ों लोगों का यह समागम सिर्फ धार्मिक निमित्त भर नहीं था बल्कि यह देश भर के सुदूर अंचलों में बसे विभिन्न कुटुम्बों के आपस में मिलने-जुलने, सुख-दुख की सूचनाएं साझा करने और विभिन्न समाजों की रीति-नीति को साझा करने का यह अवसर होता था। आज संचार के अत्याधुनिक साधन जो काम कर रहे हैं, वही काम सदियों पहले से कुम्भमेला करता रहा है। आज कुम्भ की पहचान दशनामी संन्यासियों के अखाड़े, शाही स्नान, साधुओं के डेरे और मठाधीशों-महामंडलेश्वरों का समागम है। हम यहां बात करते हैं कि आखिर क्या हैं ये अखाड़े और कैसी है दशनामियों की परम्परा?
भक्ति आंदोलन की शुरुआत दक्षिण भारत से मानी जाती है और महाराष्ट्र की संतबानी के जरिये यह उत्तर भारत पहुंची। यह वह दौर था, जब देश में विदेशी आक्रमण बढ़ने लगे थे। हिन्दु धर्म की ज्ञानमार्गी परम्परा शास्त्रार्थों और कर्मकांडों के जाल में उलझ चुकी थी और निम्नवर्ग पर तथाकथित धर्मप्रेरित अत्याचार बढ़ गए थे। इस ऐतिहासिक वक्त में इसी वर्ग से क्रान्ति चेतना पैदा हुई। दलित सन्तों ने अपनी निर्गुण आस्था की तरल-सरल धारा से समाज को राह दिखाई। यह वक्त बारहवीं सदी का था। इससे चार सदी पहले भी दक्षिण भारत में पैदा हुई, एक महान विभूति ने हिन्दू धर्म ध्वज फहराने के लिए एक विराट अभियान छेड़ा था। तत्कालीन भारत में बौद्ध धर्म की आंधी ने सनातन हिन्दू परम्परा के प्रति समाज की आस्था को हिला कर रख दिया था। हिन्दू धर्म की मान्यताओं, परम्पराओं में आ रही गिरावट को देखते हुए आदि शंकराचार्य ने ज्ञानमार्गी परम्परा को फनर्जीवित किया और अद्वैत दर्शन की मूल अवधारणा ‘बृह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ को स्थापित किया। इसके लिए उन्होने समूचे देश में अद्वैत और वेदांत का प्रसार किया। काशी के महान विद्वान मंडनमिश्र के साथ उनका शास्त्रार्थ, इस सिलसिले की महत्वपूर्ण कड़ी थी, जिसने उन्हें समूचे देश में धर्म दिग्विजयी के रूप में स्थापित कर दिया।
शंकराचार्य के सुधारवाद पर बौद्ध संस्कृति का असर भी है। विद्वानों ने इस असर को देखते हुए ही शंकराचार्य को प्रच्छन्न बौद्ध भी कहा है। दिलचस्प तथ्य है कि स्वामी विवेकानंद ने भी अमेरिका प्रवास के दौरान कहा था- ‘‘बुद्ध अपने ढंग से एक महा वेदांती थे। बौद्ध धर्म वेदांत की एक शाखा मात्र है। इसलिए शंकराचार्य को भी अनेक लोग प्रच्छन्न बौद्ध कहते हैं। बुद्ध ने विश्लेषण किया था, शंकर ने उसका संश्लेषण किया था। भारतीय संस्कृति में प्राचीनकाल से ही विभिन्न विचारधाराएं एक दूसरे पर असर डालती रही हैं। भिक्षु संघ, संघराम, विहार आदि के जरिये बौद्ध धर्म की समाज में महत्ता सिद्ध होती थी। शंकराचार्य ने इसी का अनुकरण कर प्राचीन आश्रम और मठ परम्परा में नए प्राण फूंके। शंकराचार्य ने अपना ध्यान संन्यास आश्रम पर केंद्रित किया और समूचे देश में दशनामी संन्यास परम्परा और अखाड़ों की नींव डाली।
दशनामी परम्परा:
आदि शंकराचार्य ने देश के चार कोनों में बौद्ध विहारों की तर्ज पर दक्षिण में श्रंगेरी, पूर्व में फरी, पश्चिम में द्वारका व उत्तर में बद्रीनाथ में मठ स्थापित किए, जिनका प्रबंध-संचालन विहारों की तरह ही होता था। शंकराचार्य ने संन्यासियों की दस श्रेणियां- ‘गिरी, फरी, भारती, सरस्वती, वन, अरण्य, पर्वत, सागर, तीर्थ और आश्रम’ बनाईं, जिसके चलते ये दशनामी संन्यास प्रचलित हुआ। दशनामियों के दो कार्यक्षेत्र निश्चित किए। पहला था- शस्त्र और दूसरा शास्त्र। गौरतलब है कि संन्यासियों की आदि-व्यवस्था, अद्वैतवाद और वेदांत दर्शन के संस्थापक महर्षि वेदव्यास के फत्र बालयोगी शुकदेव ने की थी। शुकदेव ने पिता से प्रेरित होकर यह कार्य किया था। पौराणिक काल से वह व्यवस्था चली आ रही थी, जिसका फनरुद्धार आदि शंकराचार्य ने दशनामी सम्प्रदाय बनाकर किया। सभी दशनामी शैवमत में दीक्षित हैं। दशनामी साधुओं के दो कर्तव्य शंकराचार्य ने निश्चित किए। पहला, वे शास्त्र-प्रवीण हों, ताकि धर्म-परम्परा विस्मृत समाज को दिशा मिल सके, दूसरा वे शस्त्र-प्रवीण हों ताकि विदेशी आक्रमणकारियों से देश की रक्षा हो सके। यह भी कहा जाता है कि शंकराचार्य के सुधारवाद का तत्कालीन समाज में खूब विरोध भी हुआ था और साधु समाज को उग्र और हिंसक साम्प्रदायिक विरोध से जूझना पड़ता था। काफी सोच-विचार के बाद शंकराचार्य ने वनवासी समाज को दशनामी परम्परा से जोड़ा, ताकि उग्र विरोध का सामना किया जा सके। वनवासी समाज के लोग अपनी रक्षा करने में समर्थ थे, और शस्त्र प्रवीण भी। इन्हीं शस्त्रधारी वनवासियों की जमात नागा साधुओं के रूप में सामने आई।
गौरतलब है कि जैन और बौद्ध धर्म भी सनातन हिन्दू परम्परा से ही निकले थे। इन दोनों धाराओं के चिन्तन और शब्दावली पर यह असर साफ दिखता है। इसी तरह जब शंकर ने हिन्दू धर्म के अभ्युदय का बीड़ा उठाया तब बौद्धधर्म की तूती बोल रही थी। जाहिर है शंकर के सुधारवाद पर बौद्ध असर दिखना ही था। यह असर शैली और शब्दावली दोनों पर पड़ा। शंकराचार्य ने दशनामी परम्परा को महाम्नाय के अनुशासन से बांधा। आम्नाय का अर्थ है रीति, वैदिक ज्ञान, फण्य-प्रेरित ज्ञान, कुल तथा राष्ट्र की परम्पराएं। जैन तथा बौद्ध दर्शन में भी आम्नाय शब्द का खूब प्रयोग हुआ है। चारों दिशाओं में स्थापित मठों को जब महाम्नाय अर्थात सनातन हिन्दुत्व की नवोन्मेषी धारा से बांधा गया, तो उसे मठाम्नाय कहा गया। इन्हीं मठाम्नायों के साथ दशनामी संन्यासी संयुक्त हुए। वन, अरण्य, नामधारी संन्यासी उड़ीसा के जगन्नाथफरी स्थित गोवर्धन पीठ से संयुक्त हुए। पश्चिम में द्वारिकाफरी स्थित शारदपीठ के साथ तीर्थ एव आश्रम नामधारी संन्यासियों को जोड़ा गया। उत्तर स्थित बद्रीनाथ के ज्योतिर्पीठ के साथ गिरी, पर्वत और सागर नामधारी संन्यासी जुड़े, तो सरस्वती, फरी और भारती नामधारियों को दक्षिण के श्रृंगेरी मठ के साथ जोड़ा गया।
सैनिक संन्यासियों का स्वरूप:
इन मठाम्नायों के साथ अखाड़ों की परम्परा भी लगभग इनकी स्थापना के समय से ही जुड़ गई थी। चारों पीठों की देशभर में उपपीठ स्थापित हुई। कई शाखाएं-प्रशाखाएं बनीं, जहां धूनि, मढ़ी अथवा अखाड़े जैसी व्यवस्थाएं बनीं। जिनके जरिए, स्वयं संन्यासी पोथी, चोला का मोह छोड़ कर, थोड़े समय के लिए शस्त्रविद्या सीखते थे, साथ ही आमजन को भी इन अखाड़ों के जरिये आत्मरक्षा (प्रकारांतर से धर्मरक्षाश् के लिए सामरिक कलाएं सिखाते थे। इस तरह अखाड़ों के जरिए धर्मरक्षक सेना का एक स्वरूप बनता चला गया। हिन्दूधर्म को इस्लाम की आंधी से बचाने के लिए सिख पंथ एक सामरिक संगठन के तौर पर ही सामने आया था। इसके महान गुरुओं ने अध्यात्म की रोशनी में लोगों को धर्मरक्षा के लिए शस्त्र उठाने की प्रेरणा दी। अखाड़ों का यह स्वरूप प्रायः हर धर्म-सम्प्रदाय में रहा है। दुनियाभर के धार्मिक आंदोलनों के साथ अखाड़ा अर्थात आत्मरक्षा से जुड़ी तकनीक को ध्यान-प्राणायाम से जोड़कर अपनाया गया। हर धार्मिक सम्प्रदाय के साथ शस्त्रधारी रहे हैं और धर्म या पंथ अथवा मठ पर आए खतरों का सामना इन्होंने किया है। बौद्ध धर्म चीन तक पहुंचाने का श्रेय पांचवीं सदी के जिन आचार्य बोधिधर्म को दिया जाता है उन्हें ही चीन की प्रसिद्ध मार्शल आर्ट शैलियों को विकसित करने का श्रेय दिया जाता है। अहिंसक धर्म के आचार्य ने मूलतः ध्यान केन्द्रित करने की तकनीक के तौर पर इस कला को जन्म दिया, जिसे बाद में आत्मरक्षा की कला के तौर पर मान्यता दे दी गई। गौरतलब है कि ध्यान ही जापान पहुंच कर जेन या जिन कहलाया।
मध्यकाल मे चारों पीठों से जुड़ी दर्जनों पीठिकाएं सामने आईं, जिन्हें मठिका कहा गया। इसका देशज रूप मढ़ी प्रसिद्ध हुआ। देशभर में दशनामियों की ऐसी कुल 52 मढ़ियां हैं, जो चारों पीठों द्वारा नियंत्रित हैं। इनमें सर्वाधिक 27 मठिकाएं गिरि दशनामियों की हैं, 16 मठिकाओं में फरी नामधारी संन्यासी काबिज हैं, 4 मढ़ियों में भारती नामधारी दशनामियों का वर्चस्व है और एक मढ़ी लामाओं की है। साधुओं में दंडी और गोसाईं दो प्रमुख भेद भी हैं। तीर्थ, आश्रम, भारती और सरस्वती दशनामी, दंडधर साधुओं की श्रेणी में आते हैं जबकि बाकी गोसाईं कहलाते हैं।
अखाड़ों की शुरुआत:
हिन्दुओं की आश्रम परम्परा के साथ अखाड़ों का अस्तित्व, यूं तो प्राचीनकाल से ही रहा है। अखाड़ों का आज जो स्वरूप है उस रूप में पहला अखाड़ा ‘अखंड आह्वान अखाड़ा’ सन् 547 ई. में सामने आया। इसका मुख्य कार्यालय काशी में है और शाखाएं सभी कुम्भ तीर्थों पर हैं। अखाड़ा शब्द के मूल में अखंड शब्द को भी देखा जाता है। कालांतर में अखंड का देशज रूप अखाड़ा हुआ। हालांकि भाषाशास्त्र की दृष्टि से अखाड़ा की यह व्युत्पत्ति सही नहीं है।
आज जो अखाड़े प्रचलन में हैं उनकी शुरूआत चौदहवी सदी से मानी जाती है। वर्तमान में हरिद्वार के कुम्भ में शाही स्नान के क्रम में प्रसिद्ध सात शैव अखाड़ों में श्रीपंचायती तपोनिधि निरंजनी अखाड़ा, श्रीपंचायती आनंद अखाड़ा, श्रीपंचायती दशनामी जूना अखाड़ा, श्रीपंचायती आवाहन अखाड़ा, श्रीपंचायती अग्नि अखाड़ा, श्रीपंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा और श्रीपंचायती अटल अखाड़ा हैं। वैष्णव साधुओं के अखाड़ों के बाद कुछ अन्य अखाड़े भी आते हैं। गुरु नानकदेव के फत्र श्रीचंद ने उदासीन सम्प्रदाय चलाया था। इसके दो अखाडे़, श्रीपंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा और श्रीपंचायती नया उदासीन अखाड़ा भी सामने आए। इसी तरह सिखों की एक पृथक जमात निर्मल सम्प्रदाय का श्रीपंचायती निर्मल अखाड़ा भी अस्तित्व में आया।
पहले सिर्फ, शैव साधुओं के अखाड़े होते थे। बाद में वैष्णव साधुओं में भी अखाड़ा परम्परा शुरू हुई। शैव जमात के सात अखाड़ों के बाद वैष्णव बैरागियों के तीन खास अखाड़े हैं- श्री निर्वाणी अखाड़ा, श्रीनिर्मोही अखाड़ा और श्रीदिगंबर अखाड़ा। शैवों और वैष्णवों में शुरू से संघर्ष रहा है। शाही स्नान के वक्त अखाड़ों की आपसी तनातनी और साधु-सम्प्रदायों के टकराव खूनी संघर्ष में बदलते रहे हैं। हरिद्वार कुंभ में तो ऐसा अनेक बार हुआ है। वर्ष 1310 के महाकुंभ में महानिर्वाणी अखाड़े और रामानंद वैष्णवों के बीच हुए झगड़े ने खूनी संघर्ष का रूप ले लिया था। वर्ष 1398 के अर्धकुंभ में तो तैमूर लंग के आक्रमण से कई जानें गई थीं। वर्ष 1760 में शैव संन्यासियों व वैष्णव बैरागियों के बीच संघर्ष हुआ था। 1796 के कुम्भ में शैव संन्यासी और निर्मल संप्रदाय आपस में भिड़ गए थे। विभिन्न धार्मिक समागमों और खासकर कुम्भ मेलों के अवसर पर साधु संगतों के झगड़ों और खूनी टकराव की बढ़ती घटनाओं से बचने के लिए अखाड़ा परिषद की स्थापना की गई, जो सरकार से मान्यता प्राप्त है। इसमें कुल मिलाकर उक्त तेरह अखाड़ों को शामिल किया गया है। प्रत्येक कुम्भ में शाही स्नान के दौरान इनका क्रम तय है।
भाषा विज्ञान की दृष्टि में अखाड़ा:
अखाड़ा, यूं तो कुश्ती से जुड़ा हुआ शब्द है, मगर जहां भी दांव-पेंच की गुंजाइश होती है, वहां इसका प्रयोग भी होता है। आज की ही तरह प्राचीनकाल में भी शासन की तरफ से एक निर्धारित स्थान पर जुआ खिलाने का प्रबंध रहता था, जिसे अक्षवाटः कहते थे। अक्षवाटः बना है दो शब्दों अक्ष और वाटः से मिलकर ।
अक्ष के कई अर्थ हैं, जिनमें एक अर्थ है चौसर या चौपड़, अथवा उसके पासे। वाटः का अर्थ होता है घिरा हुआ स्थान। यह बना है संस्कृत धातु वट् से जिसके तहत घेरना, गोलाकार करना आदि भाव आते हैं। इससे ही बना है उद्यान के अर्थ में वाटिका जैसा शब्द। चौपड़ या चौरस जगह के लिए बने वाड़ा जैसे शब्द के पीछे भी यही वट् धातु झांक रही है। इसी तरह वाटः का एक रूप बाड़ा भी हुआ, जिसका अर्थ भी घिरा हुआ स्थान है। वर्ण विस्तार से कहीं-कहीं इसे बागड़ भी बोला जाता है। इस तरह देखा जाए तो, अक्षवाटः का अर्थ हुआ जहां पर पासों का खेल खेला जाए। जाहिर है कि पासों से खेला जाने वाला खेल जुआ ही है सो अक्षवाटः का अर्थ हुआ, ‘द्यूतगृह अर्थात जुआघर।’ अखाड़ा शब्द कुछ यूं बना- अक्षवाटः अक्खाडअ, अक्खाडा, अखाड़ा। द्यूतगृह जब अखाड़ा कहलाने लगा और खेल के दांव-पेंच से ज्यादा महत्व हार-जीत का हो गया तो नियम भी बदलने लगे। अब दांव पर रकम ही नहीं, कुछ भी लगाया जाने लगा। महाभारत का द्यूत-प्रसंग सबको पता है। इसी तरह अखाड़े में वे सब शारीरिक क्रियाएं भी आ गईं, जिन्हें क्रीड़ा की संज्ञा दी जा सकती थी और जिन पर दांव लगाया जा सकता था। जाहिर है प्रभावशाली लोगों के बीच आन-बान की नकली लड़ाई के लिए कुश्ती, इनमें सबसे खास शगल था, सो धीरे-धीरे कुश्ती का बाड़ा अखाड़ा कहलाने लगा और जुआघर को अखाड़ा कहने का चलन खत्म हो गया। अब तो व्यायामशाला को भी अखाड़ा कहते हैं और साधु-संन्यासियों के मठ या रुकने के स्थान को भी अखाड़ा कहा जाता है। कहां जुआ खेलने की जगह और कहां साधु-संन्यासियों की संगत।
मेरी नज़र
शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010
भ्रष्टाचार लाइलाज नहीं
एक विकसित देश के रूप में भारत के उदय में मैं भ्रष्टाचार को सबसे बड़ी बाधा समझता हूं। अब तो देश के सर्वोच्च और अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखे जाने वाले संस्थान भी इसकी लपेट में आ चुके हैं। सन् 2001 में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस.पी. भरूचा ने आजिज आकर वक्तव्य दिया था कि न्यायालयों के 20 प्रतिशत न्यायाधीश भ्रष्ट हो चुके हैं। अब जब हमारी न्याय व्यवस्था में भ्रष्टाचार की यह हालत है तो प्रशासन का क्या पूछना। प्रशासन में भ्रष्टाचार का फैलाव तो अत्यंत भयावह स्थिति में पहुंच चुका है। इस सन्दर्भ में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी का वक्तव्य सभी को याद होगा। उन्होंने कहा था कि गरीबी उन्मूलन परियोजनाओं को केन्द्र द्वारा दिए जाने वाले प्रत्येक सौ करौड़ रुपए में मात्र 15 करोड़ रुपए ही मूल परियोजना में खर्च हो पाते हैं। शेष राशि बीच के सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े भ्रष्ट लोग खा जाते हैं।
लेकिन क्या भ्रष्टाचार केवल हमारी राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में ही व्याप्त है? मेरा अनुभव कहता है, नहीं। इनके बाहर जो हमारे व्यावसायिक समूह है, उनमें भी भ्रष्टाचार के अनेक उदाहरण हमने देखे हैं। हर्षद मेहता, केतन पारीख से जुड़े स्कैण्डल किसकी देन हैं? कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है कि मानो भ्रष्टाचार हम भारतीयों के मन में एक स्वीकृत परिदृश्य बनकर गहरी पैठ कर चुका है। शायद ही जीवन का कोई क्षेत्र इसकी पकड़ से बाहर हो।
भ्रष्टाचार केवल नैतिकता पर प्रश्न नहीं है बल्कि यह भारत जैसे गरीब किन्तु विकासशील देश की आर्थिक उन्नति में सबसे बड़ी बाधा है। बहुत सारे अर्थशास्त्री मानते हैं कि भ्रष्टाचार की जड़ में हमारे राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी हैं। अधिकांश बड़ी-बड़ी परियोजनाएं इन्हीं लोगों के दिमाग की उपज होती हैं। जनता के स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण के नाम पर बनने वाली परियोजनाओं में जबर्दस्त भ्रष्टाचार होता है। नकली दवाएं, विद्यालयों की जर्जर इमारतें, अयोग्य अध्यापक और स्तरहीन भोजन-व्यवस्था देकर आखिर किस तरह गरीबों का, इस देश का भला किया जा सकता है? शायद इसीलिए प्रख्यात अर्थशास्त्री विमल जालान का यह कहना उपयुक्त है कि भ्रष्टाचार पहले से ही गैर-बराबरी वाले समाज में असमानता को बढ़ाता है।
भ्रष्टाचार का प्रभाव हमारे उद्यमों पर भी होता ही है। मध्यम श्रेणी के, लघु श्रेणी के उद्योग जहां इससे प्रभावित होते हैं, वहीं बड़े औद्योगिक समूह भ्रष्टाचार के द्वारा बाजार में अपना एकाधिकार और वर्चस्व कायम करने की होड़ करते हैं।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भ्रष्टाचार जहां हमारी प्रगति, उत्पादकता को नुकसान पहुंचाता है, वहीं इससे निवेश भी हतोत्साहित होता है, आर्थिक हानि के साथ लोगों का व्यवस्था पर से विश्वास टूटता है। यदि हमारे देश में भ्रष्टाचार पर शुरू में ही लगाम लगाई जाती, तो सम्भवत: 80-90 के दशक में ही हमने 8 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर प्राप्त कर ली होती, जो आज 6.1 प्रतिशत तक ही पहुंच सकी है।
आज लोग निराश हैं, सोचते हैं भ्रष्टाचार अब खत्म नहीं हो सकता, पर मैं उनमें नहीं हूं। मुझे भारत के उज्ज्वल भविष्य में पूरी आस्था है। भ्रष्टाचार समाप्त करना है तो पहल उन लोगों से शुरू होनी चाहिए जो ऊंचे स्थानों पर बैठे हैं, जिन पर समाज ने, देश ने अपनी देखभाल का दायित्व सौंपा है। हमारे राजनेताओं, प्रशासकों और उद्यमियों को मिल-जुलकर इस मुसीबत से पार पाना है। सबसे पहले हमें प्रेरक, नि:स्वार्थ और साहसी नेतृत्व चाहिए। सच्चाई, पारदर्शिता और दायित्व निर्वहन के द्वारा नेतृत्व सरकार और समाज में आत्मविश्वास पैदा करता है। दुर्भाग्यवश, आज यह स्थिति नहीं है। जरूरत इस बात की है कि हम भ्रष्टाचारी को त्वरित ढंग से दण्ड देने की व्यवस्था करें। ऐसा वातावरण बने कि अभी भी ईमानदारी की कद्र है और ऐसा करने के लिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उदाहरण चाहिए। भ्रष्टाचार में आरोपित व्यक्ति, चाहे कोई भी क्यों न हो, उसे किसी दायित्व पर तब तक नहीं रखा जाना चाहिए जब तक कि वह खुद को निर्दोष साबित न कर ले। त्वरित और कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए। यदि ऊंचे पदों पर बैठे गलत तत्वों पर कारवाई हो तो हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक संदेश दे सकेंगे। पर आज तो वातावरण ऐसा है कि भ्रष्टाचार को वैश्विक परिदृश्य का अंग बताकर इसे हमारे सामाजिक जीवन की अनिवार्यता सिद्ध किया जा रहा है। वस्तुत: हमारे राजनीतिक वर्ग और प्रशासनिक वर्ग के विरुद्ध जब भ्रष्टाचार के मामले में शिथिलता बरती जाती है, तो स्वभाविक ही समाज में संदेश चला जाता है कि ऊंचे बनने के लिए भ्रष्ट तरीके अपनाने मे कोई हर्ज नहीं है।
हमारे प्रशासनिक अधिकारी बड़ी संख्या में ईमानदार रहते हैं, लेकिन धीरे-धीरे भ्रष्टाचार के मकड़जाल में उलझ जाते हैं। कैसे उलझते हैं, इससे संबंधित एक घटना मुझे याद है। सन् 1980 के दशक के मध्य में एक बार मैं दिल्ली आया हुआ था। एक शाम को होटल अशोक के यात्री निवास में डिनर पर मेरी मुलाकात मेरे एक मित्र से हुई। केन्द्र सरकार के मंत्रालयों में उसकी गिनती एक ईमानदार और स्वच्छ चरित्र वाले आफिसर के रूप में थी। भोजन के समय मैंने उसे कुछ चिंतित पाया। बातचीत में उसने अपनी तकलीफ मुझे बताई। उसने बताया कि जीवन में पहली बार आज उसने एक केस में रिश्वत ली है और तब से ही एक प्रकार की बेचैनी मुझे परेशान किए है। मैंने कहा कि रिश्वत लेना तो गलत है, इसमें कोई संशय नहीं है। और तब उसने मुझे जो कहा, सुनकर मुझे धक्का लगा। उसने कहा कि मेरे विचारों का एक हिस्सा इस कार्य को उचित ठहराता है क्योंकि मैंने अपने मंत्री को रिश्वत लेते हुए देखा है। मैं अपने उस मित्र की मन:स्थिति समझ सकता था। मुझे वह कारण समझ में आ गया कि क्यों हमारे अच्छे-भले, उत्साही प्रशासनिक अधिकारी धीरे-धीरे इस मकड़जाल में उलझते जाते हैं। लेकिन मैं यह भी कहूंगा कि जिन्हें देश-समाज को दिशा देनी है, नेतृत्व देना है, वे इस प्रकार की उलझनों में नहीं फंसते। अनैतिकता को आखिर किस तर्क से नैतिकता का जामा पहनाया जा सकता है?
सिंगापुर में सन् 80 के दशक में एक घटना घटित हुई थी। भ्रष्टाचार के आरोप में घिरे एक मंत्री के विरुद्ध जांच में आरोप को प्रथम दृष्टया सही पाया गया। उस मंत्री ने प्रधानमंत्री से स्वयं को निर्दोष बताते हुए हस्तक्षेप की गुहार लगाई। प्रधानमंत्री ने उस मंत्री को स्पष्ट कहा कि आपका काम खत्म हो चुका है। इस मामले में कड़ी कार्रवाई होगी और अब आगे चुनाव लड़ने का ख्वाब देखना भी छोड़ दीजिए। अपने नेता की बात सुनकर वह मंत्री घर चला गया। अगले दिन समाचार पत्रों द्वारा पूरे सिंगापुर को खबर लगी कि उस मंत्री ने स्वयं ही सिर पर गोली मारकर आत्महत्या कर ली। तो यह है वह संदेश, जिससे भ्रष्टाचार रुकता है, रुक सकता है। भ्रष्टाचारी व्यक्ति को कदापि कहीं से भी संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
हमारे कार्यों में पारदर्शिता झलकनी चाहिए। भ्रष्टाचार समाप्त करने का एक तरीका यह भी है कि हम अपने चुनाव में खर्च होने वाले धन पर भी नियंत्रण करें। इस बारे में हम जर्मनी का उदाहरण ले सकते है। वहां प्रत्येक प्रत्याशी पर खर्च होने वाले धन के बारे में जनता को जानकारी दी जाती है कि इतना पैसा प्रत्याशी ने कहां से जुटाया। हमें इसी के साथ ऐसा तंत्र भी विकसित करना पड़ेगा जो धन के अतिगमन पर न केवल नजर रखे वरन् जरूरत पड़ने पर तत्काल कार्रवाई भी कर सके। इस सन्दर्भ में चुनाव आयोग को और शक्तिसम्पन्न किया जाना चाहिए। प्रत्येक प्रत्याशी के अनाधिकृत और भ्रष्ट कार्यों को व्यापक रूप में प्रकाशित कर जनता को उससे अवगत कराना आवश्यक है। इस संदर्भ में त्रिलोचन शास्त्री और उनके सहयोगियों के चलते उठाए गए कदम का पूरे देश में अच्छा संदेश गया है।
प्रशासनिक भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए ऐसे बहुत से कार्यों को, उपायों को तलाशने की जरूरत है, जिनमें सरकार की कोई भूमिका नहीं है। जैसे जब सरकार ने कम्प्यूटरों का आयात करने के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता समाप्त कर दी, इलेक्ट्रॉनिक विभाग में फैला भष्टाचार एक ही झटके में समाप्त हो गया। सरकार की प्रवृत्ति कुछ ऐसी हो गई है कि वह जितनी नई योजनाएं बनाती है, प्रत्येक में सरकारी स्वीकृति प्राप्त करने के लिए व्यवसायियों को भारी कशमकश का सामना करना पड़ता है। हमें प्रत्येक क्षेत्र में भ्रष्टाचार की छोटी से छोटी संभावना का ध्यान रखकर उसे मिटाने के उपाय करने होंगे।
भ्रष्टाचार को दूर करने का एक बड़ा उपाय हमें ई-गवर्नेंस के रूप में मिल गया है। ई-गवर्नेंस ने निर्णय प्रक्रिया और निर्णय के क्रियान्वयन को भी अत्यंत आसान कर दिया है। हमें अपनी निर्णय-प्रक्रिया में अधिकाधिक पारदर्शिता रखनी होगी और इस कार्य में यदि हम साफ्टवेयर का इस्तेमाल सहज क्रियाशीलता के साथ प्रत्येक महत्वपूर्ण निर्णय-प्रक्रिया में करते हैं तो मैं मानता हूं कि इससे सरकारी कार्यों और निर्णयों में पर्याप्त चुस्ती आएगी और भ्रष्टाचार की सम्भावनाएं भी समाप्त हो जाएंगी। ई-गवर्नेंस न केवल सेवाओं को सहज-सुलभ बनाता है बल्कि इससे यह पता लगाना भी आसान है कि कहां पर निर्णय या उसके क्रियान्वयन में देरी हो रही है।
हैदराबाद के ई-सेवा केन्द्रों ने साधारण जनता की कठिनाइयों को जिस तरह दूर किया है, वह इस सन्दर्भ में एक प्रेरक उदाहरण है। सरकारी कार्यों से इसके चलते भ्रष्टाचार भी समाप्त हुआ है। सरकार की उपयोगी सेवाओं, विविध प्रमाण पत्रों, सरकारी अभिलेखों, अनुपत्रों, और तो और प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफ.आई.आर.) के लिए देय शुल्क का भुगतान भी अब इसी माध्यम से होने लगा है।
आज हमें उत्तरदायी प्रशासन चाहिए। सरकारी कार्यों में गलती, लापरवाही और भ्रष्टाचार करने वालों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए। दुर्भाग्यवश हमारे देश के अधिकांश लोकायुक्त असफल हो चुके हैं, क्योंकि एक तो उन्हें सरकार के अन्तर्गत कार्य करना पड़ता है, दूसरे उनके कार्मिकों की गुणवत्ता भी बेहतर नहीं है। हमें अब एक अलग ज्यूरी खड़ी करनी होगी जो न्यायिक शक्तियों के साथ हमारी न्याय व्यवस्था के अंग के रूप में सिर्फ भ्रष्टाचार के मामलों से निपटने के लिए त्वरित रूप में काम करे। इन्हें प्रशासकों और सरकारों के अन्तर्गत न रखकर केवल संसद के प्रति उत्तरदायी बनाना होगा। साथ ही, ज्यूरी द्वारा निर्णीत मामलों में उच्च स्तर पर सुनवाई का अवसर भी निषिद्ध करना होगा।
मैं कहना चाहूंगा कि केन्द्रीय जांच ब्यूरो भी इस संदर्भ में अपने हाथ में लिए गए मामलों मे जिस तत्परता से कार्रवाई करनी चाहिए, उसमें सफल नहीं हुआ है। केन्द्रीय जांच ब्यूरो के वर्तमान ढांचे में परिवर्तन कर उसमें तेज-तर्रार अफसरों की नियुक्ति की जानी चाहिए। केन्द्रीय जांच ब्यूरो को किसी केस के बारे में प्राथमिक तथ्यों का अन्वेषण बारीकी से करके उस पर आगे कदम बढ़ाना चाहिए।
देश के औद्योगिक जगत, उद्यमी समूहों पर भी भ्रष्टाचार खत्म करने का दायित्व है। इन्फोसिस कम्पनी में हमने मूल्यों के क्षरण को रोकने के लिए इसी सन्दर्भ में एक कदम उठाया था। हमारे एक वरिष्ठ सहयोगी ने जब हमारी मूल्य-परंपरा के विपरीत काम किया तो हमें निर्णय लेने में मात्र कुछ घण्टे लगे और उनका त्यागपत्र ले लिया गया। आज देश को दृढ़ निश्चयी और सुयोग्य नेतृत्व जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में चाहिए। ऐसे लोग हैं भी, बस जनता में विश्वास और कुछ करने का वातावरण बन जाए, तो हम सब कुछ ठीक कर लेंगे।
लेकिन क्या भ्रष्टाचार केवल हमारी राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में ही व्याप्त है? मेरा अनुभव कहता है, नहीं। इनके बाहर जो हमारे व्यावसायिक समूह है, उनमें भी भ्रष्टाचार के अनेक उदाहरण हमने देखे हैं। हर्षद मेहता, केतन पारीख से जुड़े स्कैण्डल किसकी देन हैं? कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है कि मानो भ्रष्टाचार हम भारतीयों के मन में एक स्वीकृत परिदृश्य बनकर गहरी पैठ कर चुका है। शायद ही जीवन का कोई क्षेत्र इसकी पकड़ से बाहर हो।
भ्रष्टाचार केवल नैतिकता पर प्रश्न नहीं है बल्कि यह भारत जैसे गरीब किन्तु विकासशील देश की आर्थिक उन्नति में सबसे बड़ी बाधा है। बहुत सारे अर्थशास्त्री मानते हैं कि भ्रष्टाचार की जड़ में हमारे राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी हैं। अधिकांश बड़ी-बड़ी परियोजनाएं इन्हीं लोगों के दिमाग की उपज होती हैं। जनता के स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण के नाम पर बनने वाली परियोजनाओं में जबर्दस्त भ्रष्टाचार होता है। नकली दवाएं, विद्यालयों की जर्जर इमारतें, अयोग्य अध्यापक और स्तरहीन भोजन-व्यवस्था देकर आखिर किस तरह गरीबों का, इस देश का भला किया जा सकता है? शायद इसीलिए प्रख्यात अर्थशास्त्री विमल जालान का यह कहना उपयुक्त है कि भ्रष्टाचार पहले से ही गैर-बराबरी वाले समाज में असमानता को बढ़ाता है।
भ्रष्टाचार का प्रभाव हमारे उद्यमों पर भी होता ही है। मध्यम श्रेणी के, लघु श्रेणी के उद्योग जहां इससे प्रभावित होते हैं, वहीं बड़े औद्योगिक समूह भ्रष्टाचार के द्वारा बाजार में अपना एकाधिकार और वर्चस्व कायम करने की होड़ करते हैं।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भ्रष्टाचार जहां हमारी प्रगति, उत्पादकता को नुकसान पहुंचाता है, वहीं इससे निवेश भी हतोत्साहित होता है, आर्थिक हानि के साथ लोगों का व्यवस्था पर से विश्वास टूटता है। यदि हमारे देश में भ्रष्टाचार पर शुरू में ही लगाम लगाई जाती, तो सम्भवत: 80-90 के दशक में ही हमने 8 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर प्राप्त कर ली होती, जो आज 6.1 प्रतिशत तक ही पहुंच सकी है।
आज लोग निराश हैं, सोचते हैं भ्रष्टाचार अब खत्म नहीं हो सकता, पर मैं उनमें नहीं हूं। मुझे भारत के उज्ज्वल भविष्य में पूरी आस्था है। भ्रष्टाचार समाप्त करना है तो पहल उन लोगों से शुरू होनी चाहिए जो ऊंचे स्थानों पर बैठे हैं, जिन पर समाज ने, देश ने अपनी देखभाल का दायित्व सौंपा है। हमारे राजनेताओं, प्रशासकों और उद्यमियों को मिल-जुलकर इस मुसीबत से पार पाना है। सबसे पहले हमें प्रेरक, नि:स्वार्थ और साहसी नेतृत्व चाहिए। सच्चाई, पारदर्शिता और दायित्व निर्वहन के द्वारा नेतृत्व सरकार और समाज में आत्मविश्वास पैदा करता है। दुर्भाग्यवश, आज यह स्थिति नहीं है। जरूरत इस बात की है कि हम भ्रष्टाचारी को त्वरित ढंग से दण्ड देने की व्यवस्था करें। ऐसा वातावरण बने कि अभी भी ईमानदारी की कद्र है और ऐसा करने के लिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उदाहरण चाहिए। भ्रष्टाचार में आरोपित व्यक्ति, चाहे कोई भी क्यों न हो, उसे किसी दायित्व पर तब तक नहीं रखा जाना चाहिए जब तक कि वह खुद को निर्दोष साबित न कर ले। त्वरित और कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए। यदि ऊंचे पदों पर बैठे गलत तत्वों पर कारवाई हो तो हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक संदेश दे सकेंगे। पर आज तो वातावरण ऐसा है कि भ्रष्टाचार को वैश्विक परिदृश्य का अंग बताकर इसे हमारे सामाजिक जीवन की अनिवार्यता सिद्ध किया जा रहा है। वस्तुत: हमारे राजनीतिक वर्ग और प्रशासनिक वर्ग के विरुद्ध जब भ्रष्टाचार के मामले में शिथिलता बरती जाती है, तो स्वभाविक ही समाज में संदेश चला जाता है कि ऊंचे बनने के लिए भ्रष्ट तरीके अपनाने मे कोई हर्ज नहीं है।
हमारे प्रशासनिक अधिकारी बड़ी संख्या में ईमानदार रहते हैं, लेकिन धीरे-धीरे भ्रष्टाचार के मकड़जाल में उलझ जाते हैं। कैसे उलझते हैं, इससे संबंधित एक घटना मुझे याद है। सन् 1980 के दशक के मध्य में एक बार मैं दिल्ली आया हुआ था। एक शाम को होटल अशोक के यात्री निवास में डिनर पर मेरी मुलाकात मेरे एक मित्र से हुई। केन्द्र सरकार के मंत्रालयों में उसकी गिनती एक ईमानदार और स्वच्छ चरित्र वाले आफिसर के रूप में थी। भोजन के समय मैंने उसे कुछ चिंतित पाया। बातचीत में उसने अपनी तकलीफ मुझे बताई। उसने बताया कि जीवन में पहली बार आज उसने एक केस में रिश्वत ली है और तब से ही एक प्रकार की बेचैनी मुझे परेशान किए है। मैंने कहा कि रिश्वत लेना तो गलत है, इसमें कोई संशय नहीं है। और तब उसने मुझे जो कहा, सुनकर मुझे धक्का लगा। उसने कहा कि मेरे विचारों का एक हिस्सा इस कार्य को उचित ठहराता है क्योंकि मैंने अपने मंत्री को रिश्वत लेते हुए देखा है। मैं अपने उस मित्र की मन:स्थिति समझ सकता था। मुझे वह कारण समझ में आ गया कि क्यों हमारे अच्छे-भले, उत्साही प्रशासनिक अधिकारी धीरे-धीरे इस मकड़जाल में उलझते जाते हैं। लेकिन मैं यह भी कहूंगा कि जिन्हें देश-समाज को दिशा देनी है, नेतृत्व देना है, वे इस प्रकार की उलझनों में नहीं फंसते। अनैतिकता को आखिर किस तर्क से नैतिकता का जामा पहनाया जा सकता है?
सिंगापुर में सन् 80 के दशक में एक घटना घटित हुई थी। भ्रष्टाचार के आरोप में घिरे एक मंत्री के विरुद्ध जांच में आरोप को प्रथम दृष्टया सही पाया गया। उस मंत्री ने प्रधानमंत्री से स्वयं को निर्दोष बताते हुए हस्तक्षेप की गुहार लगाई। प्रधानमंत्री ने उस मंत्री को स्पष्ट कहा कि आपका काम खत्म हो चुका है। इस मामले में कड़ी कार्रवाई होगी और अब आगे चुनाव लड़ने का ख्वाब देखना भी छोड़ दीजिए। अपने नेता की बात सुनकर वह मंत्री घर चला गया। अगले दिन समाचार पत्रों द्वारा पूरे सिंगापुर को खबर लगी कि उस मंत्री ने स्वयं ही सिर पर गोली मारकर आत्महत्या कर ली। तो यह है वह संदेश, जिससे भ्रष्टाचार रुकता है, रुक सकता है। भ्रष्टाचारी व्यक्ति को कदापि कहीं से भी संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।
हमारे कार्यों में पारदर्शिता झलकनी चाहिए। भ्रष्टाचार समाप्त करने का एक तरीका यह भी है कि हम अपने चुनाव में खर्च होने वाले धन पर भी नियंत्रण करें। इस बारे में हम जर्मनी का उदाहरण ले सकते है। वहां प्रत्येक प्रत्याशी पर खर्च होने वाले धन के बारे में जनता को जानकारी दी जाती है कि इतना पैसा प्रत्याशी ने कहां से जुटाया। हमें इसी के साथ ऐसा तंत्र भी विकसित करना पड़ेगा जो धन के अतिगमन पर न केवल नजर रखे वरन् जरूरत पड़ने पर तत्काल कार्रवाई भी कर सके। इस सन्दर्भ में चुनाव आयोग को और शक्तिसम्पन्न किया जाना चाहिए। प्रत्येक प्रत्याशी के अनाधिकृत और भ्रष्ट कार्यों को व्यापक रूप में प्रकाशित कर जनता को उससे अवगत कराना आवश्यक है। इस संदर्भ में त्रिलोचन शास्त्री और उनके सहयोगियों के चलते उठाए गए कदम का पूरे देश में अच्छा संदेश गया है।
प्रशासनिक भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए ऐसे बहुत से कार्यों को, उपायों को तलाशने की जरूरत है, जिनमें सरकार की कोई भूमिका नहीं है। जैसे जब सरकार ने कम्प्यूटरों का आयात करने के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता समाप्त कर दी, इलेक्ट्रॉनिक विभाग में फैला भष्टाचार एक ही झटके में समाप्त हो गया। सरकार की प्रवृत्ति कुछ ऐसी हो गई है कि वह जितनी नई योजनाएं बनाती है, प्रत्येक में सरकारी स्वीकृति प्राप्त करने के लिए व्यवसायियों को भारी कशमकश का सामना करना पड़ता है। हमें प्रत्येक क्षेत्र में भ्रष्टाचार की छोटी से छोटी संभावना का ध्यान रखकर उसे मिटाने के उपाय करने होंगे।
भ्रष्टाचार को दूर करने का एक बड़ा उपाय हमें ई-गवर्नेंस के रूप में मिल गया है। ई-गवर्नेंस ने निर्णय प्रक्रिया और निर्णय के क्रियान्वयन को भी अत्यंत आसान कर दिया है। हमें अपनी निर्णय-प्रक्रिया में अधिकाधिक पारदर्शिता रखनी होगी और इस कार्य में यदि हम साफ्टवेयर का इस्तेमाल सहज क्रियाशीलता के साथ प्रत्येक महत्वपूर्ण निर्णय-प्रक्रिया में करते हैं तो मैं मानता हूं कि इससे सरकारी कार्यों और निर्णयों में पर्याप्त चुस्ती आएगी और भ्रष्टाचार की सम्भावनाएं भी समाप्त हो जाएंगी। ई-गवर्नेंस न केवल सेवाओं को सहज-सुलभ बनाता है बल्कि इससे यह पता लगाना भी आसान है कि कहां पर निर्णय या उसके क्रियान्वयन में देरी हो रही है।
हैदराबाद के ई-सेवा केन्द्रों ने साधारण जनता की कठिनाइयों को जिस तरह दूर किया है, वह इस सन्दर्भ में एक प्रेरक उदाहरण है। सरकारी कार्यों से इसके चलते भ्रष्टाचार भी समाप्त हुआ है। सरकार की उपयोगी सेवाओं, विविध प्रमाण पत्रों, सरकारी अभिलेखों, अनुपत्रों, और तो और प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफ.आई.आर.) के लिए देय शुल्क का भुगतान भी अब इसी माध्यम से होने लगा है।
आज हमें उत्तरदायी प्रशासन चाहिए। सरकारी कार्यों में गलती, लापरवाही और भ्रष्टाचार करने वालों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए। दुर्भाग्यवश हमारे देश के अधिकांश लोकायुक्त असफल हो चुके हैं, क्योंकि एक तो उन्हें सरकार के अन्तर्गत कार्य करना पड़ता है, दूसरे उनके कार्मिकों की गुणवत्ता भी बेहतर नहीं है। हमें अब एक अलग ज्यूरी खड़ी करनी होगी जो न्यायिक शक्तियों के साथ हमारी न्याय व्यवस्था के अंग के रूप में सिर्फ भ्रष्टाचार के मामलों से निपटने के लिए त्वरित रूप में काम करे। इन्हें प्रशासकों और सरकारों के अन्तर्गत न रखकर केवल संसद के प्रति उत्तरदायी बनाना होगा। साथ ही, ज्यूरी द्वारा निर्णीत मामलों में उच्च स्तर पर सुनवाई का अवसर भी निषिद्ध करना होगा।
मैं कहना चाहूंगा कि केन्द्रीय जांच ब्यूरो भी इस संदर्भ में अपने हाथ में लिए गए मामलों मे जिस तत्परता से कार्रवाई करनी चाहिए, उसमें सफल नहीं हुआ है। केन्द्रीय जांच ब्यूरो के वर्तमान ढांचे में परिवर्तन कर उसमें तेज-तर्रार अफसरों की नियुक्ति की जानी चाहिए। केन्द्रीय जांच ब्यूरो को किसी केस के बारे में प्राथमिक तथ्यों का अन्वेषण बारीकी से करके उस पर आगे कदम बढ़ाना चाहिए।
देश के औद्योगिक जगत, उद्यमी समूहों पर भी भ्रष्टाचार खत्म करने का दायित्व है। इन्फोसिस कम्पनी में हमने मूल्यों के क्षरण को रोकने के लिए इसी सन्दर्भ में एक कदम उठाया था। हमारे एक वरिष्ठ सहयोगी ने जब हमारी मूल्य-परंपरा के विपरीत काम किया तो हमें निर्णय लेने में मात्र कुछ घण्टे लगे और उनका त्यागपत्र ले लिया गया। आज देश को दृढ़ निश्चयी और सुयोग्य नेतृत्व जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में चाहिए। ऐसे लोग हैं भी, बस जनता में विश्वास और कुछ करने का वातावरण बन जाए, तो हम सब कुछ ठीक कर लेंगे।
भ्रष्टाचार का दलन करना होगा ..
खुद्दार एवं देशभक्त लोगों का स्वागत है!सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने वाले हर व्यक्ति का स्वागत और सम्मान करना प्रत्येक भारतीय नागरिक का नैतिक कर्त्तव्य है। इसलिये हम प्रत्येक सृजनात्कम कार्य करने वाले के प्रशंसक एवं समर्थक हैं, खोखले आदर्श कागजी या अन्तरजाल के घोडे दौडाने से न तो मंजिल मिलती हैं और न बदलाव लाया जा सकता है। बदलाव के लिये नाइंसाफी के खिलाफ संघर्ष ही एक मात्र रास्ता है।अतः समाज सेवा या जागरूकता या किसी भी क्षेत्र में कार्य करने वाले लोगों को जानना बेहद जरूरी है कि इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम होता जा है। सरकार द्वारा जनता से टेक्स वूसला जाता है, देश का विकास एवं समाज का उत्थान करने के साथ-साथ जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों द्वारा इस देश को और देश के लोकतन्त्र को हर तरह से पंगु बना दिया है।भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, व्यवहार में लोक स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को भ्रष्टाचार के जरिये डकारना और जनता पर अत्याचार करना प्रशासन ने अपना कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं। ऐसे में, मैं प्रत्येक बुद्धिजीवी, संवेदनशील, सृजनशील, खुद्दार, देशभक्त और देश तथा अपने एवं भावी पीढियों के वर्तमान व भविष्य के प्रति संजीदा व्यक्ति से पूछना चाहता हूँ कि केवल दिखावटी बातें करके और अच्छी-अच्छी बातें लिखकर क्या हम हमारे मकसद में कामयाब हो सकते हैं? हमें समझना होगा कि आज देश में तानाशाही, जासूसी, नक्सलवाद, लूट, आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका एक बडा कारण है, भारतीय प्रशासनिक सेवा के भ्रष्ट अफसरों के हाथ देश की सत्ता का होना।शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-"भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान" (बास)- के सत्रह राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से मैं दूसरा सवाल आपके समक्ष यह भी प्रस्तुत कर रहा हूँ कि-सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! क्या हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवक से लोक स्वामी बन बैठे अफसरों) को यों हीं सहते रहेंगे?
जो भी व्यक्ति इस संगठन से जुडना चाहे उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्त करने के लिये निम्न पते पर लिखें या फोन पर बात करें :
डॉ। पुरुषोत्तम मीणा,
राष्ट्रीय अध्यक्षभ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in
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डॉ। पुरुषोत्तम मीणा,
राष्ट्रीय अध्यक्षभ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in
गुरुवार, 16 दिसंबर 2010
मैं मुसलमान तु्म क़ाफ़िर
श्री अशफाक उल्ला खां पहिले मुसलमान है, जिन्हें षडयन्त्र के मामले में फांसी हुई है । बीस पच्चीस वर्ष के इतिहास में, जब से राजनैतिक षडयन्त्रों की चर्चा सुनने में आई, अनेक आत्मायें फांसी और गोली का शिकार बना दी गयी । परन्तु आज तक किसी मुसलमान को यह शिकार बनते हुए नहीं सुना गया । इससे जनता में यह धारणा बैठ गयी थी कि मुसलमान लोग षडयन्त्रों में भाग नहीं ले सकते ।
किन्तु श्री अशफाक उल्ला खां ने इस धारणा को मिथ्या साबित कर दिया । उनका हृदय बड़ा विशाल और विचार बड़े उदार थे । अन्य मुसलमानों की भांति मैं मुसलमान वह काफिर आदि के संकीर्ण भाव उनके हृदय में घुसने ही नहीं पाये । सब के साथ सम व्यवहार करना उनका सहज स्वभाव था । निर्द्वँदता, लगन, दृढ़ता, प्रसन्नता, उनके स्वभाव के विशेष गुण थे ।
वे कविता भी करते थे । उन्होंने बहुत ही अच्छी-अच्छी कवितायें, जो स्वदेशानुराग से सराबोर हैं, बनाई है । कविता में वे अपना उपनाम हसरत लिखते थे । वे अपनी कविताओं को प्रकाशित कराने की चेष्टा नहीं करते थे । कहते-हमें नाम पैदा करना तो है नहीं । अगर नाम पैदा करना होता तो क्रान्तिकारी काम छोड़ लीडरी न करता ? आपकी बनाई हुई कविताएं अदालत आते-जाते अक्सर काकोरी के अभियुक्त गाया करते थे ।
श्री अशफाक उल्ला खां वारसी हसरत ‘शाहजहांपुर के रहने वाले थे । इनके खानदान के सभी लोग को शुमार वहां के रईसों में है । बचपन में इनका मन पढ़ने लिखने में न लगता था । खनौत में तैरने, घोड़े की सवारी करने और भाई की बन्दूक लेकर शिकार करने में इन्हें बड़ा आनन्द आता था । बड़े सुडौल, सुन्दर और स्वस्थ जवान थे । चेहरा हमेशा खिला हुआ और बोली प्रेम में सनी हुई बोलते थे । ऐसे हटटे-कटटे सुन्दर नौजवान बहुत कम देख पड़ते है ।
बचपन से ही उनमें स्वदेशानुराग था । देश की भलाई के लिये किये जाने वाले आन्दोलनों की कथायें वे बड़ी रूचि से पड़ते थे । धीरे-धीरे उनमें क्रान्तिकारी भाव पैदा हुए । उनको बड़ी उत्सुकता हुई कि किसी ऐसे आदमी से भेंट हो जाये जो क्रान्तिकारी दल का सदस्य हो । उस समय मैनपुरी षड़यन्त्र का मामला चल रहा था । वे शाहजहांपुर में स्कूल में शिक्षा पाते थे । मैनपुरी षड़यन्त्र में शाहजहांपुर के ही रहने वाले एक नवयुवक के नाम भी वारण्ट निकला । वह नवयुवक और कोई न था, श्री रामप्रसाद बिस्मिल थे । श्री अशफाक को यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि उनके शहर में ही एक आदमी है जैसा कि वे चाहते है । किन्तु मामले से बचने के लिये श्री रामप्रसाद भगे हुए थे । जब शाही ऐलान द्वारा सब राजनैतिक कैदी छोड़ दिये गये, तब श्री रामप्रसाद शाहजहांपुर आये ।
श्री अशफाक को यह बात मालूम हुई । उन्होंने मिलने की कोशिश की । उनसे मिलकर षड़यन्त्र के सम्बन्ध में बातचीत करनी चाही । पहले तो श्री रामप्रसाद ने टालमटूल कर दी । परन्तु फिर उनके श्री अशफाक के व्यवहार और बर्ताव से वह इतने प्रसन्न हुए कि उनको अपना बहुत ही घनिष्ट मित्र बना लिया । इस प्रकार वे क्रान्तिकारी जीवन में आये । क्रान्तिकारी जीवन में पदार्पण करने के बाद से वह सदा प्रयत्न करते रहे कि उनकी भांति और मुसलमान नवयुवक भी क्रान्तिकारी दल के सदस्य बने । हिन्दु-मुसलिम एकता के वे बड़े कटटर हामी थी ।
उनके निकट मंदिर और मसजिद एक समान थे एक बार जब शाहजहांपुर में हिन्दू और मुसलमानों में झगड़ा हुआ और शहर में मारपीट शुरु हो गई उस समय आप बिस्मिल जी के साथ आर्य समाज मन्दिर में बैठे हुए थे । कुछ मुसलमान मन्दिर के पास आ गए और आक्रमण करने के वास्ते तैयार हो गएं । आपने अपना पिस्तौल फौरन निकाल लिया । और आर्य समाज मन्दिर से बाहर आकर मुसलमानों से कहने लगे कि मैं कटटर मुसलमान हूं परन्तु इस मन्दिर की एक-एक ईंट मुझे प्राणों से प्यारी है । मेरे नजदीक मन्दिर और मसजिद प्रतिष्ठा बराबर है । अगर किसी ने इस मन्दिर की ओर निगाह उठाई तो गोली का निशाना बनेगा । अगर तुमको लड़ना है तो बाहर सड़क पर चले जाओ और खूब दिल खोल कर लड़ लो । उनकी इस सिंह गर्जना को सुन कर सब के होश हवास गुम हो गए । और किसी का साहस न हुआ जो आर्य समाज मन्दिर पर आक्रमण करे सारे के सारे इधर उधर खिसक गए । यह तो उनका सार्वजनिक प्रेम था । इस से भी अधिक आपको बिस्मिल जी से प्रेम था
एक समय की बात है आपकी बीमारी के कारण दौरा आ गया । उस समय आप राम-राम कह के पुकारने लगे । माता-पिता ने बहुतेरा कहा कि तुम मुसलमान हो खुदा-खुदा कहो, परन्तु उस प्रेम के सच्चे पुजारी के कान में यह आवाज ही नहीं पहुंची और वह बराबर राम-राम कहता रहा । माता-पिता तथा अन्य सम्बन्धियों की समझ में यह बात न आई । उसी समय एक अन्य व्यक्ति ने आकर उन के सम्बन्धियों से हा कि यह राम प्रसाद बिस्मिल को याद कर रहे है । यह एक दूसरे को राम और कृष्ण कहते है । अतः एक आदमी जाकर रामप्रसाद जी को बुला लाया उन को देख कर आपने कहा राम तुम आ गए । थोड़ी देर में दौरा समाप्त हो गया । उस समय उन के घर वालों को राम का पता चला । उनके इन आचरणों से उनके सम्बन्धी कहते थे कि वे काफिर हो गये हैं । किन्तु वे इन बातों की कभी परवाह न करते और सदैव एकाग्र चित्त से अपने व्रत पर अटल रहते ।
जब काकोरी का मामला शुरु हुआ, उन पर भी वारण्ट निकला और उन्हें मालूम हुआ, तो वे पुलिस की आंख बचाकर भाग निकले । बहुत दिनों तक वे फरार रहे । कहते है उनसे कहा गया कि रूस या किसी और देश में चले जाओ । किन्तु वे हमेशा यह कहर टालते रहे कि सजा के डर से फरार नहीं हुआ हूं । मुझे काम करने का शौक है, इसीलिये मैं गिरफतार नहीं हुआ हूं । रूस में मेरा काम नहीं, मेरा काम यहीं है, और मैं यहीं रहूंगा-पर अंततः 8 सितम्बर 1926 को वे दिल्ली में पकड़ लिये गये । स्पेशल मजिस्टेट ने अपने फैसले में लिखाया कि वे उस समय अफगान दूत से मिलकर पासपोर्ट लेकर बाहर निकल जाने की कोशिश कर रहे थे । वे गिरफतार कर के लखनउ लाये गये और श्री शचीन्द्रनाथ बख़्शी के साथ उनका अलग से मामला चलाया गया ।
अदालत में पहुंचने पर पहिले ही दिन स्पेशल मजिस्टेट सैयद अर्हनुददीन से पूछा -आप ने मुझे कभी देखा है ? मैं तो आपको बहुत दिनों से देख रहा हूं । जब से काकोरी का मुकदमा आप की अदालत में चल रहा है तब से मैं कई बार यहां आकर देख गया । जब यह पूछा गया कि कहां बैठा करते थे तो उन्होंने बतलाया कि वे मामूली दर्शको के साथ एक राजपूत के भेष में बैठा करते थे । लखनउ में एक दिन पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट खां बहादुर साहब इनसे मिले !
किन्तु श्री अशफाक उल्ला खां ने इस धारणा को मिथ्या साबित कर दिया । उनका हृदय बड़ा विशाल और विचार बड़े उदार थे । अन्य मुसलमानों की भांति मैं मुसलमान वह काफिर आदि के संकीर्ण भाव उनके हृदय में घुसने ही नहीं पाये । सब के साथ सम व्यवहार करना उनका सहज स्वभाव था । निर्द्वँदता, लगन, दृढ़ता, प्रसन्नता, उनके स्वभाव के विशेष गुण थे ।
वे कविता भी करते थे । उन्होंने बहुत ही अच्छी-अच्छी कवितायें, जो स्वदेशानुराग से सराबोर हैं, बनाई है । कविता में वे अपना उपनाम हसरत लिखते थे । वे अपनी कविताओं को प्रकाशित कराने की चेष्टा नहीं करते थे । कहते-हमें नाम पैदा करना तो है नहीं । अगर नाम पैदा करना होता तो क्रान्तिकारी काम छोड़ लीडरी न करता ? आपकी बनाई हुई कविताएं अदालत आते-जाते अक्सर काकोरी के अभियुक्त गाया करते थे ।
श्री अशफाक उल्ला खां वारसी हसरत ‘शाहजहांपुर के रहने वाले थे । इनके खानदान के सभी लोग को शुमार वहां के रईसों में है । बचपन में इनका मन पढ़ने लिखने में न लगता था । खनौत में तैरने, घोड़े की सवारी करने और भाई की बन्दूक लेकर शिकार करने में इन्हें बड़ा आनन्द आता था । बड़े सुडौल, सुन्दर और स्वस्थ जवान थे । चेहरा हमेशा खिला हुआ और बोली प्रेम में सनी हुई बोलते थे । ऐसे हटटे-कटटे सुन्दर नौजवान बहुत कम देख पड़ते है ।
बचपन से ही उनमें स्वदेशानुराग था । देश की भलाई के लिये किये जाने वाले आन्दोलनों की कथायें वे बड़ी रूचि से पड़ते थे । धीरे-धीरे उनमें क्रान्तिकारी भाव पैदा हुए । उनको बड़ी उत्सुकता हुई कि किसी ऐसे आदमी से भेंट हो जाये जो क्रान्तिकारी दल का सदस्य हो । उस समय मैनपुरी षड़यन्त्र का मामला चल रहा था । वे शाहजहांपुर में स्कूल में शिक्षा पाते थे । मैनपुरी षड़यन्त्र में शाहजहांपुर के ही रहने वाले एक नवयुवक के नाम भी वारण्ट निकला । वह नवयुवक और कोई न था, श्री रामप्रसाद बिस्मिल थे । श्री अशफाक को यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि उनके शहर में ही एक आदमी है जैसा कि वे चाहते है । किन्तु मामले से बचने के लिये श्री रामप्रसाद भगे हुए थे । जब शाही ऐलान द्वारा सब राजनैतिक कैदी छोड़ दिये गये, तब श्री रामप्रसाद शाहजहांपुर आये ।
श्री अशफाक को यह बात मालूम हुई । उन्होंने मिलने की कोशिश की । उनसे मिलकर षड़यन्त्र के सम्बन्ध में बातचीत करनी चाही । पहले तो श्री रामप्रसाद ने टालमटूल कर दी । परन्तु फिर उनके श्री अशफाक के व्यवहार और बर्ताव से वह इतने प्रसन्न हुए कि उनको अपना बहुत ही घनिष्ट मित्र बना लिया । इस प्रकार वे क्रान्तिकारी जीवन में आये । क्रान्तिकारी जीवन में पदार्पण करने के बाद से वह सदा प्रयत्न करते रहे कि उनकी भांति और मुसलमान नवयुवक भी क्रान्तिकारी दल के सदस्य बने । हिन्दु-मुसलिम एकता के वे बड़े कटटर हामी थी ।
उनके निकट मंदिर और मसजिद एक समान थे एक बार जब शाहजहांपुर में हिन्दू और मुसलमानों में झगड़ा हुआ और शहर में मारपीट शुरु हो गई उस समय आप बिस्मिल जी के साथ आर्य समाज मन्दिर में बैठे हुए थे । कुछ मुसलमान मन्दिर के पास आ गए और आक्रमण करने के वास्ते तैयार हो गएं । आपने अपना पिस्तौल फौरन निकाल लिया । और आर्य समाज मन्दिर से बाहर आकर मुसलमानों से कहने लगे कि मैं कटटर मुसलमान हूं परन्तु इस मन्दिर की एक-एक ईंट मुझे प्राणों से प्यारी है । मेरे नजदीक मन्दिर और मसजिद प्रतिष्ठा बराबर है । अगर किसी ने इस मन्दिर की ओर निगाह उठाई तो गोली का निशाना बनेगा । अगर तुमको लड़ना है तो बाहर सड़क पर चले जाओ और खूब दिल खोल कर लड़ लो । उनकी इस सिंह गर्जना को सुन कर सब के होश हवास गुम हो गए । और किसी का साहस न हुआ जो आर्य समाज मन्दिर पर आक्रमण करे सारे के सारे इधर उधर खिसक गए । यह तो उनका सार्वजनिक प्रेम था । इस से भी अधिक आपको बिस्मिल जी से प्रेम था
एक समय की बात है आपकी बीमारी के कारण दौरा आ गया । उस समय आप राम-राम कह के पुकारने लगे । माता-पिता ने बहुतेरा कहा कि तुम मुसलमान हो खुदा-खुदा कहो, परन्तु उस प्रेम के सच्चे पुजारी के कान में यह आवाज ही नहीं पहुंची और वह बराबर राम-राम कहता रहा । माता-पिता तथा अन्य सम्बन्धियों की समझ में यह बात न आई । उसी समय एक अन्य व्यक्ति ने आकर उन के सम्बन्धियों से हा कि यह राम प्रसाद बिस्मिल को याद कर रहे है । यह एक दूसरे को राम और कृष्ण कहते है । अतः एक आदमी जाकर रामप्रसाद जी को बुला लाया उन को देख कर आपने कहा राम तुम आ गए । थोड़ी देर में दौरा समाप्त हो गया । उस समय उन के घर वालों को राम का पता चला । उनके इन आचरणों से उनके सम्बन्धी कहते थे कि वे काफिर हो गये हैं । किन्तु वे इन बातों की कभी परवाह न करते और सदैव एकाग्र चित्त से अपने व्रत पर अटल रहते ।
जब काकोरी का मामला शुरु हुआ, उन पर भी वारण्ट निकला और उन्हें मालूम हुआ, तो वे पुलिस की आंख बचाकर भाग निकले । बहुत दिनों तक वे फरार रहे । कहते है उनसे कहा गया कि रूस या किसी और देश में चले जाओ । किन्तु वे हमेशा यह कहर टालते रहे कि सजा के डर से फरार नहीं हुआ हूं । मुझे काम करने का शौक है, इसीलिये मैं गिरफतार नहीं हुआ हूं । रूस में मेरा काम नहीं, मेरा काम यहीं है, और मैं यहीं रहूंगा-पर अंततः 8 सितम्बर 1926 को वे दिल्ली में पकड़ लिये गये । स्पेशल मजिस्टेट ने अपने फैसले में लिखाया कि वे उस समय अफगान दूत से मिलकर पासपोर्ट लेकर बाहर निकल जाने की कोशिश कर रहे थे । वे गिरफतार कर के लखनउ लाये गये और श्री शचीन्द्रनाथ बख़्शी के साथ उनका अलग से मामला चलाया गया ।
अदालत में पहुंचने पर पहिले ही दिन स्पेशल मजिस्टेट सैयद अर्हनुददीन से पूछा -आप ने मुझे कभी देखा है ? मैं तो आपको बहुत दिनों से देख रहा हूं । जब से काकोरी का मुकदमा आप की अदालत में चल रहा है तब से मैं कई बार यहां आकर देख गया । जब यह पूछा गया कि कहां बैठा करते थे तो उन्होंने बतलाया कि वे मामूली दर्शको के साथ एक राजपूत के भेष में बैठा करते थे । लखनउ में एक दिन पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट खां बहादुर साहब इनसे मिले !
मंगलवार, 14 दिसंबर 2010
गीत नहीं गाता हूँ....
पहली अनुभूति:
गीत नहीं गाता हूँ
बेनक़ाब चेहरे हैं,
दाग़ बड़े गहरे हैं
टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ
लगी कुछ ऐसी नज़र
बिखरा शीशे सा शहर
अपनों के मेले में मीत नहीं पता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ
पीठ मे छुरी सा चांद
राहू गया रेखा फांद
मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूँ
गीत नहीं जाता हूँ
दूसरी अनुभूति:
गीत नया गाता हूँ
टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात
प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूँ
गीत नया गाता हूँ
टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलको पर ठिठकी
हार नहीं मानूँगा,
रार नई ठानूँगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ
बेनक़ाब चेहरे हैं,
दाग़ बड़े गहरे हैं
टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ
लगी कुछ ऐसी नज़र
बिखरा शीशे सा शहर
अपनों के मेले में मीत नहीं पता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ
पीठ मे छुरी सा चांद
राहू गया रेखा फांद
मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूँ
गीत नहीं जाता हूँ
दूसरी अनुभूति:
गीत नया गाता हूँ
टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात
प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूँ
गीत नया गाता हूँ
टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलको पर ठिठकी
हार नहीं मानूँगा,
रार नई ठानूँगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूँ
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते
सत्य का संघर्ष सत्ता से
न्याय लड़ता निरंकुशता से
अंधेरे ने दी चुनौती है
किरण अंतिम अस्त होती है
दीप निष्ठा का लिये निष्कंप
वज्र टूटे या उठे भूकंप
यह बराबर का नहीं है युद्ध
हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध
हर तरह के शस्त्र से है सज्ज
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज
किन्तु फिर भी जूझने का प्रण
अंगद ने बढ़ाया चरण
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
समर्पण की माँग अस्वीकार
दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते
साभार -श्री अटल बिहारी वाजपेयी
सत्य का संघर्ष सत्ता से
न्याय लड़ता निरंकुशता से
अंधेरे ने दी चुनौती है
किरण अंतिम अस्त होती है
दीप निष्ठा का लिये निष्कंप
वज्र टूटे या उठे भूकंप
यह बराबर का नहीं है युद्ध
हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध
हर तरह के शस्त्र से है सज्ज
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज
किन्तु फिर भी जूझने का प्रण
अंगद ने बढ़ाया चरण
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
समर्पण की माँग अस्वीकार
दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते
साभार -श्री अटल बिहारी वाजपेयी
बात 1957 की है. दूसरी लोकसभा में भारतीय जन संघ के सिर्फ़ चार सांसद थे. इन सासंदों का परिचय तत्कालीन राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन से कराया गया.
तब राष्ट्रपति ने हैरानी व्यक्त करते हुए कहा कि वो किसी भारतीय जन संघ नाम की पार्टी को नहीं जानते. अटल बिहारी वाजपेयी उन चार सांसदों में से एक थे.
वो इस घटना को याद करते हुए कहते हैं कि आज भारतीय जनता पार्टी के सबसे ज़्यादा सांसद हैं और शायद ही ऐसा कोई होगा जिसने बीजेपी का नाम न सुना हो.
शायद यह बात सच हो. लेकिन यह भी सच है कि भारतीय जन संघ से भारतीय जनता पार्टी और सांसद से देश के प्रधानमंत्री तक के सफ़र में अटल बिहारी वाजपेयी ने कई पड़ाव तय किए हैं.
नेहरु-गांधी परिवार के प्रधानमंत्रियों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी का नाम भारत के इतिहास में उन चुनिंदा नेताओँ में शामिल होगा जिन्होंने सिर्फ़ अपने नाम, व्यक्तित्व और करिश्मे के बूते पर सरकार बनाई.
पत्रकारिता
एक स्कूल टीचर के घर में पैदा हुए वाजपेयी के लिए शुरुआती सफ़र ज़रा भी आसान न था. 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर के एक निम्न मध्यमवर्ग परिवार में जन्मे वाजपेयी की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के ही विक्टोरिया ( अब लक्ष्मीबाई ) कॉलेज और कानपुर के डीएवी कॉलेज में हुई.
उन्होंने राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता में अपना करियर शुरु किया. उन्होंने राष्ट्र धर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन का संपादन किया.
जन संघ और बीजेपी
1951 में वो भारतीय जन संघ के संस्थापक सदस्य थे. अपनी कुशल वक्तृत्व शैली से राजनीति के शुरुआती दिनों में ही उन्होंने रंग जमा दिया. वैसे लखनऊ में एक लोकसभा उप चुनाव में वो हार गए थे. 1957 में जन संघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया. लखनऊ में वो चुनाव हार गए, मथुरा में उनकी ज़मानत ज़ब्त हो गई लेकिन बलरामपुर से चुनाव जीतकर वो दूसरी लोकसभा में पहुंचे. अगले पाँच दशकों के उनके संसदीय करियर की यह शुरुआत थी.
1968 से 1973 तक वो भारतीय जन संघ के अध्यक्ष रहे. विपक्षी पार्टियों के अपने दूसरे साथियों की तरह उन्हें भी आपातकाल के दौरान जेल भेजा गया.
1977 में जनता पार्टी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया. इस दौरान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया और वो इसे अपने जीवन का अब तक का सबसे सुखद क्षण बताते हैं. 1980 में वो बीजेपी के संस्थापक सदस्य रहे. 1980 से 1986 तक वो बीजेपी के अध्यक्ष रहे और इस दौरान वो बीजेपी संसदीय दल के नेता भी रहे.
सांसद से प्रधानमंत्री
अटल बिहारी वाजपेयी अब तक नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए हैं. दूसरी लोकसभा से तेरहवीं लोकसभा तक. बीच में कुछ लोकसभाओं से उनकी अनुपस्थिति रही. ख़ासतौर से 1984 में जब वो ग्वालियर में कांग्रेस के माधवराव सिंधिया के हाथों पराजित हो गए थे.
1962 से 1967 और 1986 में वो राज्यसभा के सदस्य भी रहे.
16 मई 1996 को वो पहली बार प्रधानमंत्री बने. लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा. इसके बाद 1998 तक वो लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे.
1998 के आमचुनावों में सहयोगी पार्टियों के साथ उन्होंने लोकसभा में अपने गठबंधन का बहुमत सिद्ध किया और इस तरह एक बार फिर प्रधानमंत्री बने. लेकिन एआईएडीएमके द्वारा गठबंधन से समर्थन वापस ले लेने के बाद उनकी सरकार गिर गई और एक बार फिर आम चुनाव हुए.
1999 में हुए चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साझा घोषणापत्र पर लड़े गए और इन चुनावों में वाजपेयी के नेतृत्व को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया. गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली.
तब राष्ट्रपति ने हैरानी व्यक्त करते हुए कहा कि वो किसी भारतीय जन संघ नाम की पार्टी को नहीं जानते. अटल बिहारी वाजपेयी उन चार सांसदों में से एक थे.
वो इस घटना को याद करते हुए कहते हैं कि आज भारतीय जनता पार्टी के सबसे ज़्यादा सांसद हैं और शायद ही ऐसा कोई होगा जिसने बीजेपी का नाम न सुना हो.
शायद यह बात सच हो. लेकिन यह भी सच है कि भारतीय जन संघ से भारतीय जनता पार्टी और सांसद से देश के प्रधानमंत्री तक के सफ़र में अटल बिहारी वाजपेयी ने कई पड़ाव तय किए हैं.
नेहरु-गांधी परिवार के प्रधानमंत्रियों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी का नाम भारत के इतिहास में उन चुनिंदा नेताओँ में शामिल होगा जिन्होंने सिर्फ़ अपने नाम, व्यक्तित्व और करिश्मे के बूते पर सरकार बनाई.
पत्रकारिता
एक स्कूल टीचर के घर में पैदा हुए वाजपेयी के लिए शुरुआती सफ़र ज़रा भी आसान न था. 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर के एक निम्न मध्यमवर्ग परिवार में जन्मे वाजपेयी की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के ही विक्टोरिया ( अब लक्ष्मीबाई ) कॉलेज और कानपुर के डीएवी कॉलेज में हुई.
उन्होंने राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता में अपना करियर शुरु किया. उन्होंने राष्ट्र धर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन का संपादन किया.
जन संघ और बीजेपी
1968 से 1973 तक वो भारतीय जन संघ के अध्यक्ष रहे. विपक्षी पार्टियों के अपने दूसरे साथियों की तरह उन्हें भी आपातकाल के दौरान जेल भेजा गया.
1977 में जनता पार्टी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया. इस दौरान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया और वो इसे अपने जीवन का अब तक का सबसे सुखद क्षण बताते हैं. 1980 में वो बीजेपी के संस्थापक सदस्य रहे. 1980 से 1986 तक वो बीजेपी के अध्यक्ष रहे और इस दौरान वो बीजेपी संसदीय दल के नेता भी रहे.
सांसद से प्रधानमंत्री
अटल बिहारी वाजपेयी अब तक नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए हैं. दूसरी लोकसभा से तेरहवीं लोकसभा तक. बीच में कुछ लोकसभाओं से उनकी अनुपस्थिति रही. ख़ासतौर से 1984 में जब वो ग्वालियर में कांग्रेस के माधवराव सिंधिया के हाथों पराजित हो गए थे.
1962 से 1967 और 1986 में वो राज्यसभा के सदस्य भी रहे.
16 मई 1996 को वो पहली बार प्रधानमंत्री बने. लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा. इसके बाद 1998 तक वो लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे.
1998 के आमचुनावों में सहयोगी पार्टियों के साथ उन्होंने लोकसभा में अपने गठबंधन का बहुमत सिद्ध किया और इस तरह एक बार फिर प्रधानमंत्री बने. लेकिन एआईएडीएमके द्वारा गठबंधन से समर्थन वापस ले लेने के बाद उनकी सरकार गिर गई और एक बार फिर आम चुनाव हुए.
1999 में हुए चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साझा घोषणापत्र पर लड़े गए और इन चुनावों में वाजपेयी के नेतृत्व को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया. गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली.
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