मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

मेरी हिफाज़त का दारोमदार जिस पर थावही बांगवा आज मेरा सौदागर निकलाकिसी शायर की ऐ लाइन आज उस घटना पर बिलकुल सटीक साबित हो रही है जो की नॉएडा में घटी है जिसमे एक सगे भाई ने अपनी सगी बहन की अस्मत उस समय लूट ली जब वह घर में अकेली थी घटना भले ही छोटी हो पर इसे अमर उजाला ने पेज २ पर जितनी पर्मुखता से छापा है उस पर अब हैरानी नही होती क्यूंकि अब तो ऐ सारी बाते आम हो गयी है पर सोचता हूँ की इन खबरों को इतना स्थान देकर ऐ तथाकथित विद्वान पत्रकार समाज को क्या सन्देश देना चाहते है वैसे इतना तो किया की पीड़ित लड़की व उसके भाई का नाम नही छापा फिर भी जो कुछ छापा है उसे एक सभ्य समाज के लिए अच्छा नही कहा जा सकता वैसे भी इन सारी बातो का आज के समय में कोई मतलब तो नही रह गया है कहने सुनने का क्यूंकि टेलीविज़न ने तो देश दुनिया के हर घर को आज शयन कक्ष जैसा बना दिया है फिर भी अपने जैसे लोगो से नही बर्दास्त होता तो बातचीत कर लेते है
जय हिंद

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