गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

मै सोचता हूँ..


मैं किसी भी धर्म का नहीं हूं। मैं किसी जाति का नहीं हूं। आजाद विचारों की सुवासित हवा का झोंका चिंतन को निरंतर ताजगी देता रहे इसके लिए दिमाग की खिड़कियां खुली रखने में भरोसा करता हूं और इसकी कोशिश में लगा रहता हूं। मैं इसलिए नहीं लिखता कि लोग मुझे प्रगतिशील कहें। मैं इसलिए नहीं लिखता कि लोग मुझे कट्टरपंथी कहें। ये दोनों विचारधाराएं 'ढक्कन-बंद’ मनोविज्ञान हैं। इसमें जिस जमात ने प्रगतिशीलता का चोला पहन रखा है, वह अधिक घातक है। जो नंगा है उसे तो सब जानते हैं लेकिन जिसने छद्म ओढ़ रखा है उसे आप जानेंगे कैसे! इस छद्म प्रगतिशीलता और नंगी कट्टरवादिता ने सच पर पहरा बिठा रखा है। इस देश में कहने भर को आजादी है। कहने भर के लिए बोलने की लिखने की स्वतंत्रता है। लेकिन आप सच बोल कर देखिए। देखिए कि कितने पहरे हैं। हां, इस देश में झूठ लिखने-बोलने की पूरी आजादी है। आप जो चाहें बोलें, लिखें... मक्कारी होनी चाहिए, बस। आप रंगे सियार हों तो समाज में आपकी चल निकलेगी, बुद्धिजीवी जगत में, साहित्य में, पत्रकारिता में आपकी चल निकलेगी। राजनीति में तो बस दौड़ ही पड़ेगी।

समीर शाही

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